रविवार, 9 मई 2010

बौनी पीढ़ी


 
गमलों में

उग आये हैं
नीम बेल अनार इमली के पेड़.

गमलों में
पेड़ों को उगा देख
बसे-बसाए 'फूल से'
किराएदारों को मैंने विदा किया.

माँ ने समझाया
गमलों में पेड़ नहीं लगते.
पेड़ों को चाहिए होती है ज़मीन
अधिक क्षेत्रफल/ खुलापन
बेटा, पौधों को गमलों से मत निकालो
मत बसाओ पेड़ों को गमलों में.

मैंने कहा —
माँ! ये गमलों में बौने ही रहेंगे
मैं इन्हें खाद पानी दे ज़िंदा रखूँगा.
ये पेड़ उगाने का बौन्साई फार्मूला है – कम स्पेस में.
आजकल इसी का फैशन है
घर-घर उगाये जा रहे हैं इसी नीति से पेड़.
कुछ सालों बाद ये फल देने लगते हैं.

पिता ने कहा —
"बेटा! इनके फलों में स्वाद नहीं होगा
असली जैसा"

कमरे के भीतर से आता 'बच्चों का शोर' सुन
पिता की बात को अनसुना करने का
मुझे कल्चर्ड बहाना भी मिल गया.
— पापा सर्कस जाना है.
— पापा 'पा' देखने चलो.
पत्नी का दोनों बच्चों को पूरा सपोर्ट था

सो, पहले सर्कस
फिर फिल्म/ बारी-बारी से जाना हुआ.

पहला 'शो' सर्कस
जहाँ
बच्चों के कद में
समाहित थे पूरे के पूरे आदमी/
उनका चलना, उनका घूमना/
उनका उठना-बैठना, झूमना
बच्चों की हँसी को कंटीन्यू किये था.

समाज में जब हम देखते हैं किसी को
उम्र से घट-बढ़ हरकतें करते देखते
– हँसी छूट जाती है.
पर यहाँ तो उम्र अपनी सही जगह लिए है
कद ही नहीं है अपने ठिकाने पर.
"बौना"
परमात्मा का 'अनफेयर' 'अमेच्योर सृजन
फिर भी उसको देख
हँसी आ जाती है क्यों?

दूसरा 'शो'
३ से ६ "पा"
"ओरो"
प्रोगेरिया का शिकार
 परमात्मा का अनजस्टिस/
इकतरफा प्रोग्रेस
जिसमें शरीर तेज़ी से महीने-दर-महीने उम्र की दहलीज़ें लांघता है.
 पर पिछड़ जाती है अक्ल, उम्र के मुताबिक़.

'पा' के बाद से ही समाज में सुन्दर महिलाओं के नज़रिए में दिखने लगा था बदलाव.
जो कभी किसी वृद्ध व्यक्ति के घूरने पर बिदक जाया करती थीं घरेलू औरतें/
अब वही खोजने लगीं हैं हर बूढी घूरती नज़रों में छिपा हुआ 'बच्चा' प्यार से.
सच में 'पा' का क्रांतिकारी असर है.


सर्कस और फिल्म देखने के बाद
घर लौट आया मैं खयालों में

'मनोरंजन' एक खाद है
जो थोड़ी मात्रा में दी जाये तो
थके मस्तिष्क को रिलेक्स देती है.
नयी ऊर्जा से पुनः भर देती है.'
पर मनोरंजन की हवस
किस तरफ ले जाती है
समझ नहीं आता.
क्योंकि तब तक दिमाग सोचने लायक नहीं रहता.
मनोरंजन में बहते जाना बहते जाना
जरूरत सी लगने लगती है.
क्रिकेट मैच देखने से छूट जाए
तो उसके हाईलाइट्स देखने बेहद ज़रूरी हैं.
चाहे दिनभर ऑफिस में आँखें
कम्पूटर के आगे थकाई हों.
देश की कौन-सी विधान-सभा में
हंगामा हुआ/ जूतम-पैजार हुआ/
किस नेता की जोकरी का कारनामा
आज पूरे दिन चैनल्स पर छाया रहा.
किस छोटे कद के नेता ने बड़े बोल बोले.
किस गुदड़ी में छिपे संत के
उसके भक्त ने सारे राज़ खोले.
खबर मालूम पड़ने पर भी
बार-बार फिर-फिर
मर्डर-मिस्ट्रीयों में
मनोरंजन खोजते रहना.

-- कहाँ करें मनोरंजन का अंत.
कैसे दें आखों को आराम/
दिमाग को दो क्षण सुकून के. ...
सोचता-सोचता कब मैं
घर के टी वी के सामने
आ बैठा पता ना चला.


टी वी पर चल रहा था
'डांस-इंडिया-डांस' के जूनियर्स शो ऑडिशंस.
सभी माता-पिता अपने-अपने बच्चों से
युवक-युवतियों के शारीरिक भावों की
उलटी करवा देना चाहते थे.

खैर, मैंने
सुबह से शाम तक
और रात को भी
हर कहीं होते देखी
बौन्साई खेती.
घर की बालकोनी और छतों से लेकर
घर के अन्दर माँ की गोद तक में.

जब मैं नहीं छोड़ पा रहा हूँ
पेड़ों को गमलों में लगाने के शौक को.
तो क्यों उम्मीद करूँ
छोड़ देंगे बाक़ी भी
बोनसाई फार्मूले से
बच्चों को पोसना.

शनिवार, 8 मई 2010

बचत

जेब में
मेरे
'अठन्नी '
हाथ फैलाता
...........................................................................भिखारी
दूर दिखता.
काटता हूँ
मैं
इधर
चुपचाप कन्नी.

शुक्रवार, 7 मई 2010

असल बिहारी

हर शब्द का होता है
अपना एक इतिहास.
भाषा वैज्ञानिक खोद निकालता है
शब्द का आदिम रूप
प्रयोग में लिए जा रहे
प्रचलित शब्दों के आस-पास.

इस खुदाई में 'मूल शब्द'
किस समय – कितना गला, कितना चला
कितना घिसा, कितना पिसा.
किस शब्द ने कितनी साँसें लीं.
किस शब्द ने कब दम तोड़ा.
कौन कब हुआ लापता.
किसने अपने असल अर्थ को छोड़
पराये अर्थ की शरण ली.
कौन धर्मात्मा से बन गया डॉन.
कौन हो गया अपनी उपेक्षा से मौन.
— सभी पहलुओं पर होती है भाषा इतिहासकार की नज़र.

लोक परम्पराओं के खंडहर में
भूले-भटके टहलता हुआ
दीख पड़ता है जब कोई
शब्द का साया.
भाषा वैज्ञानिक
कान खड़े कर
उसके पदचापों को सुनने
वहाँ की ज़मीन तक खोद डालते हैं कि
मिल जाए उन्हें उस शब्द का डीएनए चित्र.
प्राप्त हो जाए उसका असल चेहरा.
.
.
.
आज मैं 'बिहारी'
के असल चेहरे को ढूँढने निकला हूँ.
जो बिहारी शब्द अपने रंग-बिरंगे अर्थों में
आज अपना असल अर्थ खो चुका है.
यदि घृणा से उच्चार दूँ — 'बिहारी'
तो संबोधित व्यक्ति लाल-पीला हुए बिना न रहे.
यदि भक्ति-भाव से बोलूँ 'माखनचोर' अर्थ में
तो लग जाए जयकारा.
किन्तु  असल बिहारी का चेहरा तो खुदाई में निकला है.
.
.
अरे! 'बिहारी' का चेहरा तो 'बीहाड़ी' से निर्मित है.
बीहड़ों में  बसता था जो आदिम शब्द
वह वहाँ उच्चरित होता था  'ड़' के अभाव में.
बीहड़ में रहता था जो बीहाड़ी.
वह बताया जाने लगा 'बिहारी'.
.
.
.
.
.

इतनी मशक्कत
इतनी खुदाई के बाद
मिल गया है मुझे बिहारी का असल आदिम रूप.
लेकिन इस थकान में
'बीहड़' शब्द की खुदाई करने का अब दम नहीं.

[मेरे कई साथी बिहार प्रांत से हैं, उनसे हिंदी-संस्कृत शब्दों पर माथापच्ची होती रहती है. यह केवल मनो-विनोद निमित्त लिखा गया है.]

रविवार, 2 मई 2010

आतंक को पहचानो

मैंने देखा है
आतंकियों को
हुआ हूँ गद्दारों से रू-ब-रू.
मैंने थाली में छेद करने वाले देखे हैं
देखी हैं हरकतें देश-विरोधी.

मैंने देखे हैं
देश के शहीदों के प्रति घृणित भाव.
मैंने उन सरकारी दामादों को देखा है
जिनकी आवभगत हर इलेक्शन में होती है
जो ज़हर उगलते हैं, दूध पीकर भी डसते हैं.
अल्पसंख्यक होने का पूरा फायदा उठाते हैं
पड़ोसी मुल्क से दोस्ती बढ़ाने के बहाने
बसें ट्रेनें चलवाते हैं.
अपनी पसंदीदा, रोज़मर्रा जरूरत की चीज़
बारूद लेकर आते हैं.

मैं देश की अर्थव्यवस्था बिगाड़ने वाले
जाली नोट छापने वाले
चेहरों को पहचानता हूँ.
मैं जानता हूँ
कहाँ मिलती है ट्रेनिंग आतंक की.
मैं ही नहीं आप भी जानते हैं
कहाँ पैदा होती है फसल — देशद्रोह की.

हम सब जानते हैं
पर बोलते नहीं
हम सब देखते हैं
पर अनजान बने रहने का
नाटक किये जा रहे हैं
बरसों से – लगातार.
हमें बचपन से ही
कुछ नारे रटा दिए गए हैं
— हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, आपस में सब भाई-भाई.
— हमें हिंसा नहीं फैलानी, हमें घृणा को रोकना है.
— साम्प्रदायिकता से बचो सब धर्मों का सम्मान करो.
तब से ही भाईचारे की भावना लपेटे हुए
मैं जिए जा रहा हूँ.
साम्प्रदायिकता समझी जाने वाली ताकतों से भी बचा हूँ.
मन में हिंसा के भाव नहीं आने देता.
घृणा चाहते हुए भी नहीं करता.
जबकि गली में मीट के पकोड़े तलता है
रोजाना गोल टोपी धारी.
नाक-मुँह बंद कर लेता हूँ.
लेकिन कुछ नहीं बोलता
किसी से शिकायत नहीं
क्योंकि ये सबका देश हो चुका है.

क्या मैं अपनी इस ज़िन्दगी को
अगले बम-विस्फोट तक बचाए हुए हूँ.
क्या मैं हमेशा की तरह इस बार भी
अपने भावों पर ज़ब्त करूँ.
कुछ ना बोलूँ.
शांत रहने का,
शांत दिखने का एक और नाटक करूँ.
मीडिया की फिर वही बकवास सुनूँ —
"बम विस्फोटों के बाद भी
आतंकियों से नहीं डरी दिल्ली
बाज़ार फिर खुले,
लोगों ने रोजमर्रा का सामान खरीदा.


छिद्र टोपीधारी
भारतमाता के दामन में
छिद्र कर चुके हैं न जाने कितने ही.
अब भरोसा नहीं होता
कि पड़ोस के शाहरुख, सलमान, आमिर को
अपने घर बुलाऊँ या उनके घर जाकर ईद-मुबारक करूँ.

......

जामिया के कुलपति
जो आज पैरवी कर रहे हैं
उन मुजरिमों की जो प्रमाणतः आतंकी हैं.
एक घटना पोल खोल देगी
जामिया यूनिवर्सिटी की
देश के प्रति वफादारी की

कारगिल के समय
शोक में था जामिया
गुजर गए थे उस दौरान उनके क्षेत्र के कोई मियाँ.
शोक प्रकट किया गया.
उसी समय हिंदी विभाग के प्रमुख
अशोक चक्रधर जी ने कहा
अब कारगिल के उन शहीदों के प्रति भी
दो मिनट का मौन रखें जिन्होंने देश के लिए जान गँवायी.
पर उर्दू अरबी विभाग के प्रोफेसरों को
बात हज़म नहीं आयी.
मजबूरी में मौन रखने के बाद
बोले — "अब गली में फिरने वाले
उन कुत्तों के लिए भी मौन रखवाइये.
जो अभी-अभी मारे गए हैं."

क्या कहती हैं ये घटना
क्या इस टिपण्णी से
सब प्रकट नहीं हो जाता.
कि कहाँ कैसी शिक्षा दी जा रही है.
कहाँ तैयार हो रही है
देशद्रोह करने वालों की पौध.

मैं जान गया हूँ.
आप जान गए.
क्या सरकार में बैठे हमारे नुमायिंदे नहीं जानते
पुलिस प्रशासन नेता सब जानते हैं.
लेकिन चुनाव सर पर बने रहते हैं.
उन्हें सेंकनी होती हैं रोटियाँ 'वोटों की'
उन्हें हमारे वोटों से ज़्यादा
टुकड़ों पर बिकने वालों के वोटों की परवाह रहती हैं.

तभी तो आज भी
लालू, मायावती, मुलायम
राहुल, सोनिया इस आतंक की लड़ाई में
सख्त बयानबाजी से ही काम चला रहे हैं.
विस्फोटों में स्वाहा हुए परिवारों को
खुले दिल से नोट मदद बाँट रहे हैं,
मदद बाँट रहे हैं. ...
 
[अपने मित्रों के चाहने पर प्रकाशित]

प्रचारतंत्र की जय [आज के नेता का स्वगत कथन]

मुझमें ना है कोई योग्यता
फिर भी मैं हीरो हूँ.

ना ही मुझमें रंग-रूप का
कोई आकर्षण है.

प्रबुद्ध जनों को शीघ्र
प्रभावित कर लूँ — असंभव है.

जिज्ञासु बालक की
जिज्ञासा को शमन करन का
मुझपर नहीं मंत्र-वंत्र है
ना ही कुछ अध्ययन है.

मैं केवल छपता रहता हूँ
पत्र-पत्रिकाओं में.
करूँ अटपटे काम
मैं रोचक न्यूज़ बना करता हूँ.

सर के बल जब चलूँ
तो भी फ्रंट पेज़ छपता हूँ.

मोटी रकम / न्यूज़ पेपर को / दूँ जैसा छाप जाऊँ.
बार-बार न्यूज़ चैनल को / मोटी रकम पहुँचाऊँ.
खुद को मनचाहा फिल्माऊँ.

पत्रकार पर जाँच कमेटी नहीं बैठती भाई.
चाहे कितना भ्रष्ट पतित हो दूर रहे सीबीआई.
ऐसे में मन कहता मेरा "प्रचारतंत्र की जय!"

[आज के नेता का स्वगत कथन]

शनिवार, 1 मई 2010

बंधुआ मजदूरी नए ज़माने की [मज़दूर दिवस पर विशेष]

आज का
प्रत्येक व्यक्ति
हो चुका है जागरूक
शिक्षा ने उसमें चेतना घुसाई है.
प्रशासन भी दे रहा है
भरपूर सहयोग शिक्षा को.


— आँखें खोलने के लिए अंधी रूढ़ियों की —
कर रहा है स्थापित विश्वविद्यालय.
व्यक्ति पा सके रोजगार
ऐसे-ऐसे पाठ्यक्रमों को
चलाता है जनता के बीच.
कि पानवाला, तांगेवाला, रिक्शावाला, दिहाड़ी मज़दूर
कर सके अपने बिजनिस को नवीन, और नवीन.


'बंधुआ मज़दूरी' 'बाल मज़दूरी' कानूनन है जुर्म.
जागरूकता अभियान ज़ारी है शासन का.
एनजीओज़ भी चिल्लाते हैं
न्यूज़ चैनल के सामने
'बंद करो बंद करो...'
लेट जाते हैं सड़कों पर — भावावेश में.
लेकिन इन सब क्रियाकलापों के बावजूद
चले जा रही 'बंधुआ मज़दूरी'
— अपने नए रूप में.


"कोंट्रेक्ट सर्विसेज़" — एक बढिया-सा नाम
पॉलिश किया सा लगता है.
जिसे क़ानून भी शोषक की सुविधानुसार तोड़-मरोड़ देता है.
अब शोषण करने का तरीका बदल गया है
बदल गए हैं — सामंत, ज़मींदार, पूँजीपति
आ रहे हैं निश्चित अवधि के
कोन्ट्रेक्ट-क्वार्डीनेटर, प्रोजेक्ट मेनेजर.


आज
बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं
पढ़े-लिखों की ज़मात — काम करने को.
बंधुआ मज़दूरी के लिए आज
बाध्य नहीं किया जाता
बाध्य हो जाता है खुद-बा-खुद
रोज़गार पाने को भटकता हुआ ग्रेजुएट.
परिस्थितियाँ उससे भरवाती हैं – पानी,
नए ज़माने और बीते ज़माने के बीच
तब वह भेद नहीं कर पाता.
उसको अपनी स्थिति एक बंधुआ मज़दूर-सी लगती है.
एक नौकरी के बाद दूसरी नौकरी की तलाश में
या उसी नौकरी को स्थिर रखने के प्रयास में
सहता है सब कुछ
और रहता है
पहले की ही तरह तनाव में.


ज़माना कहाँ बदला है?
बदले हैं तरीके — शोषण के.
अब इन तरीकों के तहत ही
होगा उन व्यापारियों का भी शोषण
जिनकी दुकानें सील हो चुकी हैं
कोर्ट के आदेश पर.


आना होगा उनको भी अपने साजो सामान के साथ
मॉल में, मल्टीनेशनल बिजनिस कॉम्लेक्स में
एक नए कोन्ट्रेक्ट के साथ
"माल बेचो, कमीशन दो."


यही नियम तो रहा है पहले भी
चौथ वसूलने का.
अधिक से अधिक वसूली को खड़े हैं
हमारे रहम दिल सरमायेदार
टैक्स देना तो है ठीक
लेकिन जड़ें उखाड़कर पेड़ की
दूसरी जगह रोंपने में सूख नहीं जायेंगी
उसकी डालें, उसकी टहनियाँ, पत्ते
शायद मर ही जाये पूरा पेड़.
.
.
.
प्रकृति सँवारती रही है हमारे परिवेश को
बसंत में सज उठती है पूरी की पूरी
पतझड़ भी पीले पत्तों को हटा
नयों को आने का अवसर देता है.
.
.
.
— "दिल्ली को बेहतर करने का है प्रयास"
बेहतर करने के प्रयास में
दिल्ली को दी जा रही आर्टिफिशियल चकाचौंध
गाँवों से निकल शहर आई संस्कृति
कहीं पूरी की पूरी अपनी पहचान ना खो दे.


बहरहाल एक बात साफ़ है
होने वाली है शुरुआत
बंधुआ मज़दूरी की
वह भी नए ज़माने की
अब नयी चकाचौंध के साथ. ....


 [मज़दूर दिवस पर विशेष]

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

उधार-गाथा

कुछ समय के वास्ते
चाहिए मुझको तुम्हारी
'जमा पूँजी'
जो तुम्हे देती रही
नेपथ्य से —
संकल्प दृढ़ता.
मन में उठी एक चाह को
'पक्का इरादा में बदलने
की सनक.

प्राप्त करके
जमा राशि तुम्हारी
मिल ना पाती
मन को तुम्हारी भाँति 'दृढ़ता'.

ज़रुरत भी
एक होती पूर्ण
दिखती दूसरी तब
इस तरह तो
बोझ मेरा कम ना होगा!

तुम उसी धन की बदौलत
उधार में मुझको दिया जो
बन चुके 'उदार' अब हो.

क्यों विषमता इस तरह की
सोचता हूँ मैं कभी ये
उसी धन से तुममें सदगुण
उसी धन से मुझमें अवगुण.

किन्तु मेरे मन में पैदा
हो रही कुछ और बातें
— घर बदल लूँ बिन बताये
— सामने बिलकुल ना आऊँ.
आ भी जाऊँ, भूल जाऊँ–धन लिया जो
— चेहरे का गेटअप बदल लूँ.
पर कुछ ना होगा –
पत्नी बच्चों को वह पहचानता है
ये बदल तो नहीं सकते
कृपा को वापस न दूँगा.

या कहूँ
ओ मित्र मेरे!
भागता भई मैं कहाँ हूँ!
– दे ही दूँगा,  सामने हूँ!
– मैं अभी मरा नहीं हूँ!
– तुम भी कैसे दोस्त मेरे!
मेरे पीछे ही पड़े हो!
नौकरी में करके नागा!
– फाके तो तुम नहीं करते!
– जी रहे हो ठाट से तुम!

पूछते हो अब मुझी से –
'मैंने तुमको क्या दिया?
कौन-सी दोस्ती निभायी?'
– सैकड़ों ही बार सुबह
तुम हमारे घर पर आकर
चायनाश्ता कर चुके हो.
– और दसियों बार दिन में
– पेटभर भोजन किया है.
— ले ही लेना अगले सप्ताह!
अगले सप्ताह भी कहूंगा –
कल या परसों तक मिलेगा.
शर्म होगी, आयेगा ना
बेशरम हो आयेगा भी
— रात १० बजे का टाइम दूँगा.
— इतने चक्कर कटा दूँगा.
भूल जाएगा यही कि
'किसलिए आता यहाँ हूँ."

रात १० बजे को इज्जत दार
ना किसी के घर जाते.
इस तरह ही उधार देकर
सदगुणी उदार व्यक्ति
अंततः हैं बदल जाते.

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

अंत की सीमा

अंत की सीमा
निर्धारित नहीं.
आरम्भ का  उदगम 
किस बिंदु को स्वीकार लें.

अभिव्यक्ति का आरम्भ
मेरे मौन का है अंत.
व्यक्त का अलम
मेरे मौन का प्रारम्भ.

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

अंत - सूक्ष्मता का

दुष्ट विचारों को
पहचान
उनसे नज़र बचाकर
निकल जाना चाहता हूँ.
पर, कैसे हो संभव
जब जानता हूँ मैं —
"परिचितों से
नज़र चुराना अच्छा नहीं
अच्छा या बुरा भाव
व्यक्त करना ज़रूरी है."

करता हूँ कभी
व्यक्त — 'घृणा' अपनी भी
उन विचारों से, जो हितकर नहीं
लिप्तता का सुख
— 'पल' का
मिथ्या है — सोचता हूँ ऐसा भी.

पर, सच्चा
सच्चा सुख — पाने में
खो गया हूँ मैं
हो गया हूँ मैं
तब से
— प्रतिक्रिया हीन
— प्रयतता से दीन
— एक दो तीन
गिनतियों में लीन.
— पूर्णतया विलीन.

ब्रहमांड में जैसे
मर गया हो कोई
विशाल चमकता 'पिण्ड'
क्रमशः लघु से लघुतर होता
द्युति से द्युतिहीन होता
बचता तो केवल कर्षण
'कृष्ण-गह्वर'
अंत — सूक्ष्मता का.

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

चुपचाप देखो मेरा दूसरा जन्म

जब अमित जी ने प्रकृति के एक नज़ारे को मेरी नज़र से जानना चाहा ...
उनका लिंक है:  http://27amit.blogspot.com/2010/04/blog-post_23.html


"आज आपके पास
आश्चर्य करने के अलावा कुछ नहीं."


देखो! शुरू हो गया है मेरा
— स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढना.
— मज़बूत चट्टान से कंकणों में बदलना.
— कंकणों से रेत में तब्दील होना.

'कंकणों का एकजुट हो जाना'
लम्बे समय बाद चट्टान रूप में पहचाना जाता है.


यह तो मेरी नियति है.
प्रकृति की निरंतर चलायमान
बहुत ही धीमी गति है.


यदि यह गति धीमी ही हो
तो मुझे कष्ट नहीं होता.
जैसे शिशु 'अकाल वृद्धावस्था' को प्राप्त नहीं होता.
बीच में जी लेता है 'चंचल बचपन''
जीता है 'प्रशिक्षु किशोरावस्था'
भोगता है 'उर्जावान यौवन'
उतारता है अनुभवपरक प्रौढ़ता
और अंत में,
बिछा जाता है अपने समाज में
अपनी क्षमताओं के साथ
अलग-अलग अनुपात में
नैतिक मूल्यों की,
रीति-रिवाजों के धागों से बुनी,
रंगीन छापों से संस्कारित
'विरासत की चादर'.


अब मेरे भीतर तक नहीं है
एक भी जलकण.
जो मेरे प्रत्येक कण को
परस्पर थामे रखने का कारण था
मेरा आकर्षण था
मैं उसके पास जब भी जाता
वह अपनी अलग पहचान खो देता
मुझसे तादात्म्य कर मुझमें विलीन हो जाता.
'यह प्रक्रिया' मेरे लिए 'प्रेम' थी.


मेरे प्रेम को मुझसे किसने छीना?
कौन उसका हरण कर गया?
किसने मेरी अन्तर्निहित
जलीय भावनाओं को वाष्पित कर दिया?


— क्या मानवीय कृत्यों ने?
या फिर विधाता की इच्छा ने?
— अरे कहीं सचमुच तो मेरा स्वाभाविक क्षरण नहीं हुआ?
अथवा नए रूप पाने को हो रहा है मेरा गमन.


करो आश्चर्य, क्योंकि मैं बहने लगा हूँ.
करो आश्चर्य, क्योंकि मैं स्थिर नहीं.
करो आश्चर्य, क्योंकि आपने अभी जाना है.
अंश और अंशी के सम्बन्ध को पहचाना है.


आत्मा का विलय परमात्मा में होता है.
क्या मैं अपने चट्टान रूप को बिना रेत किये विलीन हो सकता हूँ?
यदि नहीं, तो आश्चर्य किस बात का
मुझे भी तो सद्गति चाहिए, मोक्ष चाहिए.
नए रूप पाने को इस प्रक्रिया से निकलना ही होगा.
मुझे शान्ति से नया आकार पाने दो
हो-हल्ला न करो
इस हो हल्ले से शांत ठहरा समीर गदला हो जाएगा.
नयी सोच का बुद्धूजीवी [बुद्धिजीवी]
ग्लोबल-वार्मिंग, ग्लोबल-वार्मिग चिल्लाएगा.
इसलिए
चुप! ... शांत!!
चुपचाप देखो मेरा दूसरा जन्म.

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

गोबर का कमाल

आधा गाँव
— आधा शहर
घूमें ढोर
— आठों पहर.

डाले बाँह
— हो निडर.
बाँहों में
— बेखबर.

सुबह शाम
— सड़कों पर.
घूमें हैं
— वधु-वर.

निकला बाजू
— ट्रक होकर.
उछला "छप्प्प"
— से गोबर.

[उड़न तश्तरी पर सवार श्रीमान समीर लाल जी को समर्पित]
समीर सर से एक प्रश्न: यदि कहीं कुछ लिखा जाता है तो बिना प्रभाव पड़े क्या रहा जा सकता है? यदि गोबर "उछाल पद्धति" से खुद पर आ गिरे तो कोई प्रतिक्रिया क्या आप नहीं देंगे?

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

मिस्टर पेटूराम की चिकित्सा

मिले एक दिन बाबा राम
बोले — कर लो प्राणायाम
पूरे दिन में बस दो बारी
खाना खाओ शाकाहारी
तीन समय लो प्रभु का नाम
सुबह, दोपहर और शाम
जागो चार बजे तुम रोज
आलस छोडो, भर लो ओज
पाँच जगह की करो सफाई
नोज़, इयर, टंग, स्किन, आई
लंच और डिनर के बीच
छह घंटे का अंतर खींच
सप्ताह में जो दिन हैं सात
करो किसी दिन व्रत की बात
ऑफिस के घंटे हैं आठ
मेहनत कर लो खोल कपाट
रात नौ बजे तक सो जाओ
टीवी प्रोग्राम नहीं चलाओ
पिचकेगा दस दिन में पेट
छोटा नहीं लगेगा गेट.

[इस बार बच्चों के लिए गिनती वाक्यों के बीच में  है]

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

मिस्टर पेटूराम

एक थे मिस्टर पेटूराम
 उनका पेट भरा गोदाम
दो थे उनके मोटे हाथ
घूम नहीं पाते एक साथ
तीन बार ना खाते थे
हर दम चरते रहते थे
चार बार खाते थे चाट
बर्गर, भल्ले, टिक्की हाट
पाँच बार पीते थे चाय
दरवाजे पर रोती गाय
छह बार तम्बाकू पान
इधर-उधर हर तरफ निशान
सात बार करते स्मोक
खाँसा करते खुल-खुल खौंक
आठ बार पीते कोल्ड-ड्रिंक
हेल्थ से छूटा पूरा लिंक
नौ पैकेट खाते थे चिप्स
सूखे-सूखे रहते लिप्स
दस घंटे करते आराम
गिर जाते थे जहाँ धडाम.

कबाड़ीवाला

घर के एक कोने में
कर दी हैं इकट्ठी
घर के सभी सदस्यों ने
— अपनी-अपनी रद्दी.


माँ
महीनों से
जोड़ रही थी जिस कबाड़े को
वह कबाड़ा बिक गया
— पिता की बिना मर्जी.


लास्ट सन्डे
न्यूज़पेपर में छपा जो
एडवरटायिज़ — "फ्लेट एमआईजी बनेंगे".
— खोजते हैं अब उसी को भैया-भाभी.


पिछले हफ्ते ही खरीदा —
"रोज़गार"
वैकेंसी थी — किसी कम्पनी को
चाहिए था 10 वीं पास 'चौकीदार'.


घर में तो मैं
चौकीदारी कर न पाया.
ले गया सब — कबाड़ीवाला.


बहन ने जो सिलने दिए थे सूट
उसकी पर्ची नहीं मिलती.
संदेह रद्दी पर उसे है.
— अब, लौटाएगा न सूट दर्जी.

पिता झल्लाते ढूँढ़ते हैं
'योग की पुस्तक'
वृद्धावस्था पेंशन की
— उसमें रखी थी अर्जी.

माँ थी सचमुच परेशान
शाम तक उसे करना था
— 'इंतजाम'.
इसलिए तो बेची थी रद्दी  
मिलेगा पैसा
तो बनेगी शाम की सब्जी.

कबाड़ीवाला
ले गया अरमान सारे.
मेरा संभावित रोज़गार.
भैया-भाभी के सपनों का घर.
बहन का नया फैशन.
वृद्ध माँ-पिता की आखिरी उम्मीद.
— अब काम किया जाएगा फर्जी.

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

दिवा-स्वप्न

एँ! क्या मैं सो रहा था?
जो मैंने देखा, समझा — झूठ था?
इंडिया टीवी की खबर था?
क्या सच नहीं?
अजमल कसाब को फाँसी हो चुकी है!
सीरियल बम-ब्लास्टों के के गुनाहगार — जेल के अन्य कैदियों के द्वारा मार दिए गए!

अजी! मैंने लाइव टेलीकास्ट देखा!
भारत ने जो-जो सबूत पाकिस्तान को दिए
उनके बिनाह पर पाकिस्तान ने दहशतगर्दियों पर मुकम्मल कार्रवाई की.
भारत ने जैसा-जैसा चाहा पाकिस्तान ने वैसा-वैसा ही किया.
ज़रदारी मुशर्रफ शरीफ सब एक साथ
मनमोहन के एक बार बुलाने पर/ दिल्ली में/
पूरे मीडिया के सामने/ आतंक के खिलाफ शुरू हुयी मुहीम में
हाथ से हाथ मिला/ गले से गले लगा/ आकर/ मिलकर खड़े हो गए.
ध्यान रहे — वह ईद का मौक़ा नहीं था
जिस कारण वे इकट्ठा थे.
साल में एक-आद बार ऐसा करना उनके साम्प्रदायिक सौहार्द वाले शेड्यूल में है.


मेरी शहीदों की फेहरिस्त
फिल्मी कलाकारों, क्रिकेटरों की फेहरिस्त से ज़रा छोटी है.
फिल्मी कलाकार, क्रिकेटर्स की फेहरिस्त तो मैं डेली अपडेट करता हूँ.
— मीडिया जो है.
लेकिन शहीदों की फेहरिस्त को मैंने कई सालों से अपडेट नहीं किया.
आजादी से पहले के शहीद ही मुझे याद है.
वह भी पूरे नहीं.
क्या बाद के शहीद तन्ख्वाही थे, इसलिए उन्हें लिस्ट में ना जोडूँ?
— कारगिल में कौन-कौन शहीद हुए?
— मुंबई हमले में किस-किस कमांडो ने जान गँवाई?
— दिल्ली के जामिया नगर में किस पुलिसकर्मी की जान पर बन आई?
— भारत-पाक सीमा पर घुसपैठियों से टक्कर लेते किस-किस जवान ने गोली खायी?
अरे भाई, उन सबके नाम खोजो/ मुझे दो/ मैं लिस्ट अपडेट करूंगा.
मैं भी एक शाम नए शहीदों के नाम करूंगा.
अब शहादत का जज्बा नहीं, जो शहादत का काम करूँ?
नाम ही याद कर लूं/ शहीदों की लिस्ट ही अपडेट कर लूं.
किसी आई-क्यू कम्पटीशन में
भूले-बिसरे कोई पूछ ही बैठे.
— तब/ मुझे यदि याद रहा
— बताकर/ इस कमजोर शरीर के साथ
— जीत लूँ/ एक बड़ी धनराशि.

अँ! क्या मैं सो रहा था!!
जो मैंने देखा/ समझा — झूठ था/ इंडिया टीवी की खबर था?
क्या सच है?
क्या सच है —
संत साधु-समाज की भागीदारी बड़ी है देश की राजनीति में?
रामदेव और मायावती ने खोज लिया है अपना-अपना चन्द्रगुप्त?
विदेशी कम्पनियों का रंगीन पानी बेचकर बने बिगबी और लिटिलटी
बन नए हैं भारत रत्न के दावेदार?

क्या सच है —
भाजपा को मिल गए हैं चुनाव लड़ने को राष्ट्रीय मुद्दे?
कांग्रेस को फिर से सरकार बनाने को गांधी परिवार के मुरदे?

क्या सच है —
हो गयी है देश में शान्ति, सौहार्द, परस्पर भाईचारा?
या झूठ है? सरासर झूठ है?
मैं झूठ ही देखे जा रहा हूँ लगातार?
या मैं लाख कोशिशों के बावजूद जाग नहीं पा रहा हूँ?
जाग नहीं पा रहा हूँ....

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

सविता

पिये! तुम गरमी में ना आओ.
जहाँ पर रहती हो, रह जाओ.

ताप से मैं आकुल-व्याकुल
ह्रदय-खग करता है कुल-कुल
पिकानद साथ रहो मिलजुल
आपका रूप बड़ा मंजुल
उसी को मेरे लिए सजाओ.
जहाँ पर रहती हो, रह जाओ.

आपके मौन शब्द मुझसे
न जाने कितने ही अतिशय
बात कह जाते थे रसमय
पिये! फिर से वैसी ही लय
लिए तुम मुझमय गाने गाओ.
जहाँ पर रहती हो, रह जाओ.


चली फिर भी तुम इक दो पग
रोकते हैं खग भी जग-जग
सजी आती हो क्यूँ री अब
मना करते हैं फिर से सब
अरी! तुम बात मान जाओ.
जहाँ पर रहती हो, रह जाओ.

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

उर द्वंद्व

दो उरों के द्वंद्व में
लुप्त बाण चल रहे
स्नेह-रक्त बह रहा
घाव भी हैं लापता।

नयन बाण दोनों के
आजमा वे बल रहे
बाणों की भिडंत में
स्वतः चार हो रहे।

बाणों की वर्षा से
हार जब दोनों गए
मात्र एक बाण छोड़
संधि हेतु बढ़ गए।

नाग पाश बाहों का
छोड़ दिया दोनों ने
स्नेह घाव दोनों के
कपोलों पर बन गए।

दोनों ही हैं शस्त्रविद
दोनों पर ब्रह्मास्त्र है
दोनों सृष्टि हेतु हैं
न करें तो विनाश है।

दोनों तो हैं संधि-मित्र
प्रलय काल जब भी हो
जल-प्लावन काल में
मनु पुत्र उत्पन्न हों॥

[एक हलकी कविता, श्रृंगारिक कविता का प्रारंभ १९८९]

रविवार, 11 अप्रैल 2010

राजा आम

एक रसीला पीला आम
दो केलों ने किया सलाम।
तीन संतरे पकड़ के लाये
चार चीकू का गला दबाये
पाँच पपीते मिलकर बोले —
छह लीची के छिलके खोले
सात सेब को चाकू मारा
आठ अनारों का हत्यारा
नौ नारियल पटक के फोड़े
दस तरबूजों पर बम छोड़े
सज़ा दो इनको राजा आम
पिचका, कर दो काम तमाम।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

करूँ विश्वास कैसे मैं

नवजात बच्चे
लगते अच्छे
निर्विवादित सत्य है यह।
पूछते — 'अंतर'
— दिखाकर
जाति, उनका धर्म क्या है?

नहीं उत्तर पास मेरे
आपकी नज़रों में कट्टर
जातिवादी मैं रहूँगा।
चाहे चूमूँ गाल उनके
या ह्रदय वात्सल्य भर लूँ
नयन पर कुछ चमक लाये।

प्रश्न पूछूँ प्रश्न बदले :
'बीज' से बन 'वृक्ष' जाए
बीज उत्तम खोजते क्यों?

बीज के अन्दर छिपा
इक पेड़ पूरा।
पर, अधूरा —
ज्ञान ये तो।
'कल्प' ही होगा
नहीं 'विष' होने पावेगा
"करूँ विश्वास कैसे मैं?"

[कभी-कभी प्रश्न का उत्तर प्रतिप्रश्न में छिपा होता है.]

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

आखिरी जिद

मेरे ह्रदय में
पुण्य भी है पाप भी
वरदान भी है शाप भी
बिलकुल अवध के एक ढाँचे सा।

सोचता
सब नष्ट कर दूँ।
फिर से बनाऊं 'एक मंदिर'
शुद्ध, सुन्दर, पुण्य-संचित
यही बालक मन की मेरी
आखिरी जिद।

एक राखूँ
एक अर्पित।
हाथ मेरे
है खिलौना
'श्री राम भूमि बाबरी मस्जिद'।

(वैसे तो इस समस्या का हल निकल नहीं पाया है। लेकिन बालक मन तुरत-फुरत फैसला करना जानता है।)

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

पर्दा-पर्दा

बुर्केवाली माताओं बहनों!

पर्दा तब करो जब धूल भरी आंधी चले।

पर्दा तब करो जब सर्द हवा के झोंके चलें।

पर्दा तब करो जब किसी की बुरी नज़र से बचना भर हो।

पर्दा तब करो जब लज्जा शरीर में संभाले न संभले।

पर्दा तब करो जब कुकर्म किया हो कोई।

पर्दा तब करो जब संक्रामक रोग लग गया हो कोई।

पर्दा तब कतई मत करो जब फोटो खिंचवानी हो भई।

पर्दा तब कतई मत करो जब पहचानने आया हो कोई।

पर्दा तब कतई मत करो जब आप ही से बात होती हो।

पर्दा तब कतई मत करो जब लोगों की आँखों पर पर्दा पड़ा हो ।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

पुलिस-पीड़ित

वाह रे आज का प्रजातंत्र / घूमते सब गुंडे स्वतंत्र / हाय, फैला कैसा आतंक / लगे हैं रक्षक-भक्षक अंक / पुलिस पर एक बड़ा है मंत्र / किसी को पीट करें परतंत्र / घोर है उनका अत्याचार / रोयें सब जन-जन हो लाचार / बनाया था जिनको सरताज / वही सर चढ़े हुए हैं आज / लूटते लाज करें दुश्काज / गिरी न अब तक उनपर गाज।

प्रभु ! एक विनती है सुन लो / पुलिस को छोडो या धुन दो / हमें तुम ऐसे रक्षक दो / जो भक्षक के भक्षक हों।

या फिर,

करें ये राज करें ये राज / शीघ्र आयें हरकत से बाज़ / नहीं तो हो जाएगा नाश / हमारा ये सुन्दर समाज।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

भक्तकवियों की कारिस्तानी

कवि हुआ पस्त, संस्कृति मंच पर हिला कमर / कह गयी नग्न नारी, rahne में नहीं कसर/ आज की सभ्यता परम्परा विकृत बर्बर / दिख रही आधुनिक किंचित वसना मुझे निडर।
पर्तिपल परिवर्तित रीधान, हटता दुराव / वस्त्रों से बाहर आने का बढ़ रहा चाव / संकोच शील मर्यादा संयम का विधान / ढीला पड़ता जा रहा माजिक संविधान।
कवि का कौशल ! कामुकतानल रत आठ प्रहर / उद्धत बालक-बालिका सकल हर गाँव शहर / बन रहा अवस्था अनअनुकूल सबका स्वभाव। / मिट रहा उचित-अनुचित का अंतर भी, बहाव / आया है गीतों के द्वारा दो राय नहीं / गंभीर विषय पर भी कर लेते हीं-हीं-हीं।
कामोदगार विस्तार विकल मम अंतस्तल / उत्तेजक गीतों का पीते नर-नारी गरल / दोलन नितम्ब करने वालों की नयी पौध / गीतों पर थिरकाती उरोज, रहता न बोध।
खुल रहा कौन-सा अंग कौन-सा हैं बिम्बित / वस्त्रों में, टांगों को फैंके करके लंबित / वासना केंद्र बन गया मात्र नारी शरीर / है छिपा रही उरुओं की बस छोटी लकीर।
छोटे बालक-बालिका हमारे अब घर पर / अश्लील गीत गाते हैं सुनते मात-पितर / होते हैं कुपित वृद्ध, लेकिन उनपर प्रभाव / पड़ता बिलकुल भी नहीं बना जिद्दी स्वभाव।
कुंठित है यौवन आज तपित मन काम अनल / हर पल चिंता रत जीवन कैसे जियें सरल/ हर विषय मनन से पूर्व करे मस्तिष्क वरण / नारी में बिन वस्त्रों की कल्पना का चित्रण।
उरु कसा पेंट हो विपर्यस्त परिधान वक्ष / अथवा छोटे निक्कर के साथ बनियान, भक्ष / करने की सोचा करता हूँ नारी शरीर / टिक जाते चख क्यों देख हरण द्रोपदी चीर।
टीवी में कनु के द्वारा उत्थित गोपी वसन / नारी को नंगा देखन के अभ्यस्त नयन / हो चुके, चाह कर भी न छूटती है आदत / धर दिया ताक पर धर्म , पुण्य कर दिए विगत।
ले रहे श्वास अंतिम लटके हैं पाँव कबर / फिर भी फिल्मी वृद्धों की जिह्वा लपर-लपर / करती स्ट्रक्चर देख बेटी का उत्तेजक / लाते फिल्मों में दिखलाते उरु-वक्ष तलक।
फिल्मी निर्माता नव कन्या को दिखा सपन / मामला व्यक्तिगत ठहराता कर संग शयन / फैशन परेड में हो ऐय्याशों की जमघट / 'मोडल सुप्रीम' जजमेंट किया करते लम्पट।
है 'प्रतिस्पर्धा' आवश्यकता आधुनिक समय / है सता रहा नारी को भी 'पिछडन' का भय / सो लगा दिया हैं दांव स्वयं का ही शरीर / करवाने को तत्पर रहती खुद हरण-चीर।
क्षुद्रता प्रतिष्ठित करने का अब चला चलन / है स्टिकी चेपी वाली नारी सम्मानित जन / 'उपभोग वस्तु' आवश्यकता होती मौलिक / है भोगवादी कल्चर की नारी सिम्बोलिक।
मैं क्यों न कहूँ कटु उक्ति, देखता हूँ सब कुछ / अब नहीं हुवे संकोच देखने में दो कुच /कर रहे श्रवन हैं आप, स्वयं करता वाचन / आनंद ले रहा स्यात आपका रमता मन।
कटु सुनकर भी 'चिकने बैंगन' प्रतिक्रिया हीन / अपशब्द नहीं कहते, मनोरंजन करें बीन / महिषा समक्ष मैं बजा गाल करता बकबक / उसका होता मन-रंजन मेरा शुष्क हलक।
आदर्श आज बच्चों के फिल्मी कलाकार / जाने-अनजाने डाल रहे दूर संस्कार। अब नहीं फिल्म उद्देश्य मात्र मन का रंजन / शिक्षा प्रसार का व्याज, सभ्यता का भंजन।
फिल्मों में प्राय 'फादर' को महिमामंडित / कर सभ्यशिष्ट दिखलाते पर जोकर 'पंडित'/ दुष्कर्म रोकने के निमित्त दुष्कर्म घटित / दुष्कर्म दिखा दर्शक को करते आमंत्रित।
भड़काते हैं केवल उनकी वासना भूख / दुष्कर्म देख जाता संवेदन सभी सूख / फिर सरेआम ह्त्या पर भी रहता दर्शक / वह खडा वहीँ रहता है इज्जत लुटने तक।
जो जमा हुआ था वर्षों से सत संस्कार / घिस गया रगड़ने में सारा उसका उभार / पड़ गए गले में तब से ही इतने बवाल / अश्लील किसे अब कहें? — यही उठता सवाल।
है ब्रह्मचर्य को तौल रहा फिर फिर संयम / पाता बिलकुल भी नहीं संतुलित अंतर मम। / जो रहा सदा से ही विषयों में अनासक्त / संचारित ह्रदय से होता था जो शुद्ध रक्त।
घुल गए प्रतीची से आकर उसमें विकार / संगीत पोप पर थिरक रहे पग, व्यभिचार / करता रहता भीतर ही भीतर अवचेतन / मस्तिष्क , पटकता हाथ-पाँव करता लेतन।
दे रहा तर्क आज का युवा — "क्या है अनुचित? / है कौन व्यक्ति जो नहीं काम से अब कुंठित? / अब की ही करता बात नहीं देखो अतीत / कितने श्रृंगारिक रच डाले पद, चित्र, गीत।
जिसको कहते भगवान् कृष्ण था महारसिक / सौलह हज़ार रानियाँ धरा करता।" 'धिक्-धिक्' — करता मेरा मन सुनकर अपलापी अलाप / कवियों ने ईश्वर पर खुद का थोंप दिया पाप।
रच रहे तभी से कविगण किस्से मनगणंत / मन के विकार का आरोपण करते तुरंत। / भक्ति के बहाने हुआ बहुत कुछ है अब तक / हो रहा आज भी और ना जाने हो कब तक?
ईश्वर की भक्ति हो अथवा दे...श की भक्ति। / विकृत होती जा रही अर्चना की पद्धति। ....
पण्डे भी अपना स्वार्थ सिद्ध करने निमित्त / भक्ति में दिखलाते अपने को दत्तचित्त/ घंटा निनाद ओ' थाली करके इधर-उधर / ईश्वर को भोग लगा पर खुद का बढे उदर।
... शेष बाद में ...

उलटबांसी

यहाँ से वहाँ तक

जामा मस्जिद के पास
एक से अधिक मीट की हैं दुकान
मुर्गे जैसे छोटे जीवों के शव-शरीर
टंगते — ललचाते मुल्लाजी।

भैंसों गायों बकरों का सर
सजने के लिए दुकानों पर
अल्लाह मियाँ ने खुद कुरआन में लिखवाया।

अब तो पण्डे भी देवी-देव
पर, पशु-पक्षी की बलि चढ़ा
प्रसाद रूप में बंटवाते / खाते
बतलाते — वेदों में है उल्लेखित यह।

'सिक्ख-पंथ' सरदारों का
प्रिय भोज — 'आमलेट' अंडे का
'गुरु-ग्रन्थ साहिब' में नानक ने
मेथड है दिया —
"मक्के दी रोटी सरसों दा साग साथ"।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

आदर

"भूत के दो पाँव उलटे
हुआ करते हैं।"
सुनी यह बात — नानी से।

समझते हैं लोग
तबसे
मेरी दृष्टि आदर से
सभी को देखती है।
पाँव पर झुक्की
हुई 'रेस्पेक्टी है।

बुधवार, 31 मार्च 2010

उदाहरण

मैं हूँ कामी
—अनुगामी
आगे चलती मम परिभाषा।

औ' परिभाषा पदचिह्नों पर
मैं उछलकूद करता जाता।

या कभी-कभी
छुक-छुक-छुक कर
इक छोर पकड़ परिभाषा का
अपने मित्रों को साथ लिए
इक छोर और निर्मित कर उनके हाथ दिए
पीछे-पीछे
दौड़े चलते परिभाषा के।

तब अकस्मात्
पाठक श्रोता
का ध्यान भंग होता
या, कर्षण
खींच-खींच
लदने की इच्छा करा
सीटियाँ — बजवाता।

सोमवार, 29 मार्च 2010

मेरा प्रेम

— कवि! तुम्हे सबसे अच्छा क्या लगता है?
— शून्य!
— अर्थात?
— खुला आकाश!
— क्यों?
— क्योंकि वहाँ मेरी कल्पना विचरण करती है।
— अच्छा, तो क्या तुम कल्पना से प्रेम करते हो?
— हाँ, बहुत!!
— बहुत, फिर भी कितना?
— जितना मैं अपने आप से करता हूँ।
— लेकिन यह शरीर और जीवन दोनों ही क्षण-भंगुर हैं। तब, क्या तुम्हारा प्रेम भी...
— हाँ, मेरा प्रेम भी क्षणिक है, जब तक यह शरीर और जीवन है, तब तक ही कल्पना से प्रेम जीवित है। या यूँ कहें, कल्पना भी तब तलक ही है।
— कवि! तब तुम्हारी आत्मा का क्या कार्य है?
— वह मुझे सदैव प्रेम करने की प्रेरणा देती रहती है। लौकिक के अतिरिक्त अलौकिक वस्तुओं से भी वह प्रेम करना सिखाती है। मेरी कल्पना लौकिक वस्तुओं से निर्मित होकर भी अलौकिकता की गरिमा लिए हुए है।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

पीड़ा होती

[हमारा समाज... भारतीय समाज।
पूरे भारत में जितने भी प्रदेश हैं, भाषाएँ हैं, बोलियाँ हैं; पहनावे, रहन-सहन, रीति-रिवाज, पारस्परिक व्यवहार ... सभी में विविधता।
एक सामान्य बात ... सांस्कृतिक शिष्टता। बेशक पच्छिम हवा ने उच्छृंखल किया, जीवन पद्धति को बदल दिया लेकिन ... अपने अपने त्योहारों-उत्सवों पर असल रंग में ...
दूसरे हमारे समाज में बुद्धीजीवियों, साधु-संतों, कलाकारों, संगीतकारों, शिक्षकों, राजनेताओं, देशभक्तों का सम्मान किया जाता है। ... सभ्य समाज में होना भी चाहिए लेकिन जब मीडिया द्वारा या प्रशासन द्वारा कामुक, लम्पट, भ्रष्ट चरित्र के कथित आधुनिक सोच के धनी लोगों को इन विशेषणों को देकर महिमा-मंडित किया जाए ... तो दिल में हूक उठती है, पीड़ा होती है। आज का युवा जिन बातों से व्यथित है उन सब मसलों को इस कविता में उदघाटित करने का प्रयास किया गया है... ]
(१)
हो जाती जब कोई उलझन
होने लगती जब है अनबन
पड़ जाती रस्ते में अड़चन
आती संबंधों में जकड़न
खोता समाज में जब बचपन
होने लगता युग परिवर्तन
आदर्शों का उत्थान पतन
देखा करते निर्लज्ज नयन
शिक्षित होकर होते निर्धन
हो रही व्यर्थ एजुकेशन
-- ऐसे में जलता है तनमन
व्याकुलता से झन झन झननन।


(२)
खुद को पावरफुल कहता मन
मानता नहीं किंचित वर्जन
मैं उल्लंघन बो लता जिसे
मन करे उसी का आलिंगन
कल्पनाशील कितना हैं मन
हर दम करता रहता चिंतन
बाहों में भरके नंग बदन
शय्या पर करता रहे शयन
संबंधों में होती जकड़न
भागा-भागा फिरता है मन
-- तब नहीं मानता कोई बहन
कामुकता में, झन झन झननन।


(३)
कर सको आप तो करो श्रवन
सभ्यता सनातन का कृन्दन
चिंता चिंतन सत सोच मनन
मर गया हमारा संवेदन
कर रही विदेशी कल्चर
घर की परम्पराओं का मर्दन
अब नहीं रहे सत भाव
ना माटी ही माथे का चन्दन
देहात शहर बन रहे और
बन रहे शहर नेकिड लन्दन
-- होता मर्यादा-उल्लंघन
पीड़ा होती झन झन झननन।


(४)

जब समाचार पत्रों को भी

घर में छिपकर पड़ता यौवन

छापते अवैध संबंधों पर

झूठे सच्चे जब अंतरमन

जब करे दूसरे मज़हब का

कोई हुसैन नंगा सर्जन

गीतों की धुन पर जब बच्ची

करती है कोई फूहड़पन

एडल्ट फिल्म को देख करे

बच्चा जब बहना को चुम्बन

-- हो जाते खुद ही बंद नयन

पीड़ा होती झन झन झननन।

(५)

विलुप्त हुआ परिवार विज़न

कमरे-कमरे में टेलिविज़न

जो भी चाहे जैसे कर ले

चौबीस घंटे मन का रंजन

सबकी अपनी हैं एम्बीशन

अनलिमिटेशन, नो-बाउंडएशन

फादर-इन-ला कंसल्टेशन

इंटरफेयर, नो परमीशन

बिजली पानी चूल्हा ईंधन

न्यू कपल सेपरेट कनेक्शन

--पर्सनल लाइफ पर्सनल किचन

पीड़ा होती झन झन झननन।

(६)

बच्चे बूढ़े इक्वल फैशन

इक्वल मेंटल लेवल नैशन

बच्चे तो जीते ही बचपन

बूढों में भी बचकानापन

डेली रूटीन सीनियर सिटिजन

वाकिंग, लाफिंग, वाचिंग चिल्ड्रन

वृद्धावस्था पाते पेंशन

फिर भी रहती मन में टेंशन

एँ! ये कैसी एजुकेशन

आंसर देंगे जब हो ऑप्शन

-- है रेपर नोलिज नंबर वन

पीड़ा होती झन झन झननन।

(७)
सत्ता पाने को नेतागन
जनता में करते ज़हर वमन
चाहे समाज टूटे-बिखरे
करने को रहते परिवर्तन
जब सत्ता में उत्थान पतन
होता रहता पिस्ता निर्धन
जब देश चुनावों में रहता
कितना व्यर्थ होता है धन
हा! राजनीति में घटियापन
बन रहे 'दलित', फिर से हरिजन
-- गांधी पर जब सुनता अवचन
पीड़ा होती झन झन झननन।
(८)
जब होता हो सब कोनो से
विकृत कल्चर का अतिक्रमण
बंदी हो जाए समाज
कुछ भ्रष्ट चिंतकों के बंधन
करने लागे कोई विरोध
जब सरस्वती तेरा वंदन
उदघोष मातरम् वन्दे का
जब बोले नहीं यहाँ रहिमन
हम करें संधि लेकिन दुश्मन
सीमा पर करता हो 'दन-दन'
-- तब क्रोध किया करता क्रंदन
पीड़ा होती झन झन झननन।
(९)
स्कूलों के एन्युल फंक्शन
नैतिकता का कर रहे वमन
टैलेंट नाम पर विक्साते
मो... डलिंग केटवोक फैशन
जब भक्ति नाम पर हो प्रेयर
और देशभक्ति को जन-गन-मन
शिष्टता नाम पर जब टीचर
बनने को कहता हो मॉडर्न
गुरु करे नहीं जब शिष्यों का
जीवन उपयोगी निर्देशन
-- अंतर्मन करता रहे रुदन
पीड़ा होती झन झन झननन ।
(१०)
फायर जैसी फिल्मों में जब
खोखला दिखाते हैं रिलिजन
कर देते भ्रष्ट तरीके से
वर्जित दृश्यों का उदघाटन
जब जन की गुप्त समस्या पर
मोटे चश्मे से हो दर्शन
मिल जाए कथित विद्वानों का
सहयोग समर्थन अपनापन
होती है मन में तभी चुभन
क्यों सही नहीं होता चिंतन
-- आँखों में ध्वंसक उठे जलन
पीड़ा होती झन झन झननन॥

बुधवार, 24 मार्च 2010

नंगा सच

"करंट आता है
नहीं छूना उसे"

पड़ोस का बच्चा
कूद फांद कर आया
'फंसी पतंग' एंटीना से छुड़ाने
-- बड़ी उतावली से।

देश की बढ़ती
आबादी
ने मिला दी
हैं, गली की
छतें सारी।

पहले कभी
जब न मिली
थी छत किसी की
सब -- एक थे
-- परिवार से।

अब, हम न सही
छतें सही
-- मिल कर रहें।

एक मंजिल थी कभी
दूसरी बन ही गयी
-- किरायेदारों के लिए।

अब तीसरी मंजिल
बनाने की तैयारी हो रही
है/ भाई-भाभी के लिए।

हम सामने वाले पड़ोसी से
दस मंथ पीछे हैं
-- कंस्ट्रक्शन में।

अब सामने घर के हमारे
ईंट चट्टे में, बदरपुर
रेट, रोड़ी, आयरन
-- बिखरे पड़े।

मेरा लफंगा
भाई छोटा
'कार में' --
न जाने कौन आई, पर कटी
-- घुमाने ले गया।
साथ/ पूसी भी गया है।

मसाला बनाने की मशीन
शोर करती
--'घरड-घरड'
दब गयी आवाज जिससे
--'परड-परड'
बाथरूम के पास वाले
एक छोटे कमरे
से आ रही।

फलाने/ पब्लिक स्कूल का रिक्शा
रुका/ सामने वालों के बच्चे
आ गए/ हैं गुनगुनाते
-- गीत फिल्मी।
गा रही लड़की
अपने अनउगे अंगों का गीत
और लड़का
बेझिझक
चिल्ला रहा -- कुछ पूछता
कुछ वर्ष पहले
थे सामने -- जब दूध पीता
'नासमझ'
अब छिप गए हैं आड़ ले
-- उनके विषय में।

माँ बहुत खुश--
'आये बच्चे गीत गाते'
हैं पड़ोसी
और मैं भी
-- चुप्प --
आदत पड़ गयी है
'गीत सेक्सी' रोज़
सुनने की
-- गली में।

(इस अकविता का जन्म मध्यम वर्गीय सामाजिक परिवेश में मेरी उस विवशता को व्यक्त करता है जिस विरोध को मैं चाहते हुए भी स्वर नहीं दे पाता)

सोमवार, 22 मार्च 2010

धर्म नहीं बतलाता चोटी रखना

परशुराम की दीक्षा का दूसरा भाग : "धर्म"

है आर्य सभ्यता अपनी बहुत सनातन
वैदिक संस्कृति की बनी हुई वह साथन
जिसमें नारी को पूरा मान मिला है
जननी देवी माता स्थान मिला है
पर वही आज माता बन गयी कुमाता
कामुकता से भर गयी काम से नाता।
है अंगों की अब सेल लगाया करती
फिल्मों में जाकर अंग दिखाया करती
ईश्वर प्रदत्त सुन्दर राशी का अपने
वह भोग लगाकर, खाना खाया करती।
क्या लज्जा की परिभाषा बदल गयी है?
क्या अवगुंठन की भाषा बदल गयी है?
या बदल गयी है इस भारत की नारी?
या सबने ही लज्जा शरीर से तारी?
अब सार्वजनिक हो रही काम की ज्वाला
हैं झुलस रही जिसमें कलियों सी बाला
अब बचपन में ही निर्लज्ज हो जाती है।
अपने अंगों के गीत स्वयं गाती है।
हे परशुराम! कब तलक चलेगा ऐसा?
क्या आयेगा अब नहीं तुम्हारे जैसा?
जिसमें निर्लज्ज नारी वध की क्षमता हो
हो बहन किवा बेटी पत्नी माता हो।

मैं बहुत समय पहले जब था शरमाता
जब साड़ी पहना करती भारत माता
माँ की गोदी में जाकर ममता पाता
पर आज उसी से मैं बचता कतराता
क्योंकि माँ ने परिधान बदल लिया है
साड़ी के बदले स्कर्ट पहन लिया है
है भूल गयी मेरी माता मर्यादा
भारत में पच्छिम का प्रभाव है ज्य़ादा।
है परशुराम से पायी मैंने शिक्षा।
इसलिए मात्र-वध की होती है इच्छा।
जब-जब माता जमदग्नी-पूत छ्लेगी
मेरी जिव्हा परशु का काम करेगी।
ये चकाचौंध चलचित्रों की सब सज्जा
देखी, नारी खुद लुटा रही है लज्जा
क्या पतन देख यह, मुक्ख फेर लूँ अपना
या मानूँ इसको बस मैं मिथ्या सपना।
सभ्यता सनातन मरे किवा जीवे वे
गांजा अफीम मदिरा चाहे पीवे वे
या पड़ी रहे 'चंचल' के छल गानों में
वैष्णों देवी भैरव के मयखानों में?
या ओशो के कामुक-दर्शन में छिपकर
कोठों पर जाने दूँ पाने को ईश्वर?

या करने दूँ पूजा केवल पत्थर की?
छोटी होने दूँ सत्ता मैं ईश्वर की?
क्या मापदंड नारी को उसका मानूँ
सभ्यता सनातन यानी नंगी जानूँ
चुपचाप देखता रहूँ किवा परिवर्तन
आँखों पर पर्दा डाल नग्नता नर्तन।

क्या धर्म व्याज पाखण्ड सभी होने दूँ?
भगवती जागरण वालों को सोने दूँ?
क्या सम्प्रदाय को धर्म रूप लेने दूँ?
यानी पंथों के अण्डों को सेने दूँ?
जब पंथ और भी निकलेंगे अण्डों से
औ' जाने जावेंगे अपने झंडों से
प्रत्येक पंथ का धर्म अलग होवेगा
तब धर्म स्वयं अपना स्वरुप खोवेगा।
"है धर्म नाम दश गुण धारण करने का।
है मार्ग उन्नति का सबसे जुड़ने का।
है धर्म वही कर सके प्रजा जो धारण।
जैसे सत्यम अस्तेय धृति क्षमा दम।
है धर्म नहीं बतलाता चोटी रखना।
यज्ञोपवीत गलमुच्छ जटायें रखना।
कच्छा कृपाण कंघा केशों को रखना।
कर-कड़ा, गुरुद्वारे में अमृत चखना।
प्रेरणा मिले इनसे तो बात भली है।
हैं धर्म अंग, वरना यह रूप छली है।
जो लिए हुए आधार वही अच्छा है।
बस धर्म सनातन वैदिक निज सच्चा है।"

(अपने मित्र के विशेष आग्रह पर कुछ अंश)

मंगलवार, 16 मार्च 2010

कल भी मैं कहूँगा

आज तुम इन्क्रीमेंट ना दो, ... ना दो
कल भी मैं कहूँगा
तुम देनवारे हो, दाता हो, स्वामी हो, गोविन्द हो
मेरे अप्रैसल फ़ार्म में मेरा पुनः मूल्यांकन
करने वाले अथार्टी पर्सन
मेरा परमोशन रोके रहो, ... रहो
तुम्हारे लिए
पेज़ दर पेज़ एन्टर करते
तुम्हारे ही दिल में एक दिन
एन्टर कर जाऊंगा।

तुम्ही ने दिया है यह हक़
तुम्ही ने हाथों में बाँधी है एन्टर करने की स्पीड
यह मैं हर क्षण जानता हूँ।

गति यहाँ सब कुछ है, ...
सांस गिन कर लो
शरीर के अकस्मात् पड़ने वाले
दबावों को झेलते रहो।
वाशरूम की तरफ मुँह न करो
कॉफी, सूप चाय का जायका भूल जाओ।
टारगेट अचीव करो
वही पुराने कछुआ सर्वर की पीठ पर चढ़कर।

ओ, मेरे धैर्य की पराकाष्ठा गोविन्द
मेरी भाषा से भयभीत रहने वाले मिलिंद
मैं तुम्हें पहचानता हूँ
मांगो तुम चाहे जो
मांगोगे - दूंगा -
श्रम, गति, समय।
तुम दोगे जो - मैं सहूंगा -
उपेक्षा, डांट-फटकार बेवजह की।
"परमोशन"
आज नहीं/ कल सही
कल नहीं/ साल भर बाद सही
सही ...
मेरा तो नहीं है बस
कि अपनी ही पीठ थपथपाऊँ
अपने हर कार्य पर।
खुद को धकेलता ले जाऊं
महत्पूर्ण कुर्सियों के
आस-पास।

ऍक ही नौकरी है ... बाबूजी
और जगह सीवी डाला नहीं
बेवजह की भागदौड़ होती नहीं अब
खूब पैसा बर्बाद कियें हैं
चिट्ठी पत्री में
नौकरी के आवेदनों को करते-करते।

स्वामि!
आज नहीं/ कल सही
सोच समझकर
थोड़े ही शब्दों में
किफायत के साथ
एक-एक, दो-दो
अच्छे-अच्छे शब्द
सबको बाँट दो।

काम करने वाले
अपने ही काम में
रूचि नहीं ले पा रहे हैं
कोशिश करके
अधरों के मध्य एक
स्मिति को बैठाओ और
सबके पास घूम जाओ।

फिर देखना
सभी काम करने वाले
नवीन उत्साह नयी उमंग
के साथ काम करने लगेंगे।

आज तुम इन्क्रीमेंट ना दो
ना दो
कल भी मैं कहूँगा।

रविवार, 14 मार्च 2010

प्राइमरी का मास्टर

प्राथमिक अध्यापक
मतलब, प्राइमरी स्कूल का मास्टर
बाल मस्तिष्क की उपजाऊ भूमि पर
नैतिकता के बीज छितरने वाला।

अच्छे बच्चे --
जिद नहीं करते/
झूठ नहीं बोलते/
बड़ों की बात मानते हैं।
शोर नहीं मचाते/
गंदे नहीं रहते/
सुबह उठकर दांत मांजते हैं।

ना जाने कितने ही नैतिक सूत्र
किताबी शिक्षा के साथ-शाथ
निरंतर खाद पानी की तरह दिया करता है।

प्राइमरी का मास्टर --
बाल मस्तिष्क की कल्पनाशीलता को
पंख ज़रूर लगा देता है लेकिन
ज़मीन पर मजबूती से टिके रहने के लिए
उसकी सोच को तर्क के भारी जूते भी पहनाता है।

उसके तर्क के ये जूते
घर में काफी शोर करते हैं
मम्मी! आप दादा जी के सामने मुँह ढकती हो/
घर के बाहर बाल खोल कर निकलती हो, क्यों?
पापा! आप मंगल को शेव क्यों नहीं करते?
स्कूल जाते बिल्ली रास्ता काट जाए तो क्या होता है?
कोई बात तीन बार बोलने से ही क्यों पक्की मानी जाती है?
क्या पहली और दूसरी बार की बातें झूठ बोलने की छूट देती हैं?

घर की सुख-शांती के लिए
माँ-पिता अक्सर उसे
भोले बाबा के मंदिर ले जाते हैं
हाथ जुडवाते हैं/
माथा टिकवाते हैं/
मंदिर के बाहर तर्क के जूते खुलवाते हैं।
इस तरह उसे आस्तिक बनाते हैं।

परिणामस्वरूप
बच्चा आस्तिक बनता है
आँख मूंदकर बिना सोचे
अटपटे विश्वासों में इजाफा करता है।
पुस्तक में रंगीन चिड़ियों के पंख रखकर समझता है --
"आने वाली परीक्षा में ज्यादा नंबर आयेंगे"
चील कौवे देखकर शकुन-अपशकुन गड़ता है।
अपने से ज्यादा भगवान् पर भरोसा रखता है।
हिचकी को किसी का याद करना और
आँख भुजा आदि फड़कने को
अच्छी-बुरी घटनाओं से जोड़ता है।

प्राइमरी का मास्टर
जहां बच्चे की सोच को
वृहत और लोजिकल बनाने का प्रयास करता है
वहीं मम्मी-पापा द्वारा दी गयी घरेलू शिक्षा
उसे सीमित और केवल अपने लिए जीना सिखाती है।
धीरे-धीरे पुस्तकीय शिक्षा और घरेलू ट्रेनिंग
एक-दूसरे में घुल-मिल जाती है।

प्राइमरी का मास्टर
स्कूल में केवल मास्टर नहीं होता
वह मासिक पगार का जरूतमंद
मजबूरी में कक्षा के बच्चों को रोके रखने वाला
- एक बेरियर
दोडते-भागते बच्चों के लिए
- एक स्पीड ब्रेकर
एजुकेशन के कई पडावों में से
- एक स्टोपेज होता है।

क्या इन रुकावटों की जरूरत है?
सोचता हूँ -- नहीं है।

माँ और पिता
बच्चे को जन्म दें/
पालें-पोसें/
इतना काफी है।
चलने-बोलने लगे तो उसे
घरेलू इस्तेमाल का साधन मात्र ना बनाएं
शिक्षा के सतत, गतिशील, तार्किक प्रवाह में धकेल दें।

प्राइमरी का मास्टर
जो भी पढ़ाता है
बच्चा घर में आकर दोहराता है, सबको सुनाता है।
इस कारण सबको पता रहता है कि वह क्या पढ़ता है।
लेकिन
यूनिवर्सिटी का मास्टर
जो पढ़ाता है
उसे बच्चा ना दोहराता है, ना अपनाता है
साथ ही घर के अभिभावकों को भी कोंफ्युजन रहता है।

फिर भी
"प्राइमरी का मास्टर" संबोधन
शिक्षा जगत में
कामचलाऊ सम्मान पाता है
उच्च शिक्षा की सीढ़ियों के पायदान पर
बैठा सकुचाता है
नए वेतन आयोग की सिफारिशों में
बाद में याद आता है।
किसान, मजदूर की ही भाँति
बीज की गुणवत्ता निखारने वाला मास्टर
अपने रहन-सहन की गुणवत्ता नहीं सुधार पाता।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

आखिरकार

आखिरकार
बेचारे की शादी
नाईयों में ही हुयी।

जान गए लोग
अपनी कोलोनी का 'शर्मा'
रिश्तेदारों को
'शर्मा' बताने में शर्माता था
' उसके लड़के ने
मेरे साथ ही इंटर किया है'।
कभी दिया था उसने
ज़ोरदार भाषण
उखाड़ी थी बखिया
पंडितों द्वारा
बनायी वर्णव्यवस्था की।
और मिला था उसको
"प्रथम पुरस्कार"।

आज
लड़ नहीं सकता वो
समाज की वर्णव्यवस्था से
कभी
प्रेम विवाह का
प्रबल समर्थक था
फिर भी
उच्च वर्ण की कन्या से
'प्रेम करने से'
झिझकता था।

अनजाने ही हो बैठा
'प्यार' उसको
एक शर्माती कन्या से
जो 'शर्मा' थी।
कल्पना ने उसको
हिम्मत दिलायी थी।
संघर्ष अधिक उसको
करना नहीं पड़ा
सहर्ष स्वीकारा था
कन्या के पापा ने
'समधी'
बने थे दोनों के पापा।

इधर लड़के के 'मौसा' ने
उधर लड़की की 'चाची' ने
रिश्तेदारों में
मचाया था हल्ला —
"अपनों में शादी नहीं की भाई,
ओ गोलू की मम्मी,
ओ हड्डू की तायी।"

प्रेम विवाह से
दोनों सुखी थे
अनजान रहकर।

पर,
दुर्भाग्य उनका
निकले वे दोनों ही
जाति से 'नाई'।
तब से
भयंकर, होती लड़ाई ।

(वैसे जातीय हीनता और श्रेष्ठता की भावना अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुयी है। इस कारण, सामाजिक तोर पर दुराव-छुपाव आज भी देखने में मिलता है जो हास्यास्पद स्थितियों को जन्म देता है।)

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

आत्मघात

उन्होंने काम किया
बड़ी तेज़ी से किया
दस दिन का काम दो दिन में ख़त्म किया
आज वो सुखी हैं – हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं ।

काम करते हुए लोगों को देख मन ही मन दुखी हैं
कि – "इनका काम कब ख़त्म होगा"

मेहनतकश गधे पर यदि एक दिन
बोझा न रखा जाए तो बिदक जाता है
इधर-उधर चरता घूमता है,
अपने से दूसरे गधे भाइयों से मिलता है,
हाल-चाल पूछता है,
उसे बातचीत के दौरान दुलत्तियों का इस्तेमाल सूझता है ।

काम का निरंतर बने रहना कितना ज़रूरी है
नहीं तो कोई भी मेहनतकश
काम की ग़ैर-मौजूदगी में पगला जाएगा
ईडियट होकर घूमेगा
ईडियट्स के बीच बैठेगा
ईडियटटी करेगा
और अच्छे-बुरे की पहचान खोकर
कथित बुद्धिजीविता के मोटे-चश्मे से
थ्री-ईडियट्स देखने का दंभ भरेगा
देखकर सराहेगा
वाहियात चीज़ों पर मुस्कराएगा
फिल्म का बेसिक मैसेज भूल जाएगा
फिल्म में परोसे फूहडपने को दिल खोलकर अपनाएगा
अमर्यादित होती जा रही भारतीय संस्कृति के कलेजे पर
हाथ रखकर चिल्लाएगा – "ऑल इज़ वेल "

(सभी नयी सोच अपनाने वालों को समर्पित)

मेरे पाठक मेरे आलोचक

Kavya Therapy

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नयी दिल्ली, India
समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.