मंगलवार, 29 मार्च 2011

प्रशंस-भोज


कलाकार का धर्म 
कला में कल की रचना करना. 
एक नया आकार बना कर 
कल को रंगी करना. 
बीते कल को सोच 
ध्यान से धीरे-धीरे चलना. 
क्षण-भंगुर सपनों में 
अपने नेत्र-निमीलन मलना. 
कलाकार-प्रतिभा का भूषण 
केवल भोग नहीं है. 
उसकी भी पाने की इच्छा 
प्रशंस-भोज रही है.

मंगलवार, 22 मार्च 2011

उतरन होली

होली पीछे गयी .. रंग की 
आयी है ... 'उतरन होली'. 
रंगे हुए सियारों की अब 
सुन लो 'हुआ-हुआ' बोली.

"मेरे अनशन ने दिलवाया 
भूखों को .. खाना भरपेट. 
पर 'सुभाष' ने खून माँगकर* 
खुलवाया .. हिंसा का गेट." 

"मेरे ... बन्दर बँटवारे ने 
रोकी .. छीना-झपटी कैट.
पर .. 'नाथू' लंगूर भगाता 
पार .. 'राम नाम' के गेट."*

"मेरे .. 'हरिजन' संबोधन ने 
दी दलितों को बिग नेम-प्लेट. 
'भीमराव जी' फिर भी घूमे 
'अम्बेडकर' का नाम लपेट."*

"वैष्णवजन तो तैने कहिये 
'शैतानों' को ... दे भरपेट. 
उनको दुश्मन कहो देश का 
जो रहते हैं 'आउट ऑफ़ डेट." 



मंगलवार, 15 मार्च 2011

संतापों से दग्ध हुए हृदय में 'त्वरा आह्लाद' है होली

संस्कृत और हिन्दी व्याकरण में 'ह' और 'स/श/ष' को दग्धाक्षर कहा जाता है. 
– क्यों? इन्हें दग्धाक्षर क्यों कहते हैं? 
– क्या ये सभी वर्ण दग्ध (जले हुए) हैं? अथवा 
– इनका नाद दग्ध करता है? 
इनकी गणना ऊष्म व्यंजनों के अन्दर भी होती है. 
– क्या इनके उच्चारण पर ऊष्मा का निस्सरण होता है? अथवा 
– ये उच्चरित होकर ऊष्मा संग्रहित करते हैं? 

जी हाँ, प्रत्येक ध्वनि के अपने-अपने विशेषण हुआ करते हैं और उन विशेषणों का शब्द-रूप औचित्यपूर्ण हुआ करता है. अनायास शब्द-निर्माण या भाव-चित्र के लिये अनुमान से शब्द गढ़ना संस्कृत व्याकरण में तो रहा नहीं |

प्राणियों में मनुष्य ही सार्थक ध्वनि समूहों वाली भाषा का प्रयोग करता है. शोक, हर्ष व अन्य अनुभूतियों पर आंगिक क्रिया करने के साथ-साथ वह उनसे सम्बद्ध ध्वनियों का उच्चारण भी अनायास कर बैठता है. यदि इन सभी ध्वनियों पर ध्यान दें तो पायेंगे कि इनमें से संतापसूचक, पीड़ा-प्रदर्शक और आह्लाद-द्योतक ध्वनियाँ ही 'ऊष्म व्यंजनों वाली' है |

शरद, हेमंत, शिशिर की ऋतुओं में शीत के सताने पर जो ध्वनियाँ मुख से  निकलती हैं वे भी ऊष्म व्यंजनों से बाहर नहीं. कँपकँपी में "ह्ह्ह , हो..हो..हो..",  जलन में श्वास मुख से भीतर-बाहर करते हुए - "शsss.." ध्वनि करना |

कभी ध्यान दें बच्चों को चोट लगने पर, ... जो सबसे पहली ध्वनि होगी .. वह 'अ', 'आ', के स्वरों में मिली ऊष्म व्यंजनों की ही होगी |

विदेशी 'ओह, आsह, आउच' शब्दों में अपनी पीड़ा का मोचन करने वाले लोग भी इन 'ओ,आ' स्वरों में अपनी दग्धता छिपाए हैं | 

'अ, आ' आदि स्वरों को दग्धाक्षरों से पूर्व तभी जोड़कर बोला जाता है जब अपनी पीड़ा या अपनी अनुभूति को दूसरे तक संप्रेषित करना लक्ष्य हो. बच्चा 'उवाँ-उवाँ' करके रोये अथवा कोई मोर्डन महिला 'आउच' करे - ये ध्वनियाँ संकेत मात्र हैं कि उनकी परेशानी को समझा जाये, उन्हें उचित सुरक्षा दी जाये | 

वस्तुतः शब्दों में अधिकांश स्वरों का प्रयोग उन्हें बल प्रदान करने के लिये होता है. अधिक स्वरों का आगम शब्द को  आकर्षक और बरबस ध्यान खींचने वाला बना देता है |

'होली' शब्द में दूसरा व्यंजन 'ल' है जो अन्तस्थ व्यंजन है. यह अनुभूति (हृदय) की आह्लादात्मक ध्वनि है. 'ह' ध्वनि संताप व्यक्त करने के साथ-साथ आह्लाद को भी दर्शाती है |

हँसी के रूप में 'हा.हा.हा...' और हीं.हीं.हीं...' ध्वनियाँ प्रयुक्त होती हैं. इस प्रकार 'ह' और 'ल' दोनों ही व्यंजन आह्लादात्मक उल्लास को व्यक्त करते हैं. किन्तु इन दोनों में अंतर यही है कि 'ल' वर्ण पूर्णतः आह्लाद को दर्शाता है जबकि 'ह' वर्ण की विशेषता 'उन्मोचन' की है |

प्रफुल्लित हृदय 'ल' ध्वनि की पुनरावृत्ति से झूम उठता है, तो संकुचित विश्रांत मन 'आलंबन और उद्दीपन' की श्रेष्ठता के आधार पर संचित पीड़ा को ... 'ह' ध्वनि के रूपों से ... मोचता है | 

पहला रूप शोक का है — 'हा! हाय-हाय! होs.. च्च.[क्लिक ध्वनि] !' ये मनःस्थिति की स्वाभाविक प्रस्तुति है. 
दूसरा रूप हर्ष का है — "हें! [आश्चर्य]......... हु हा हा हा!!  [हँसी] ......... हीं.हीं.हीं.' ये मनःस्थिति की वैकल्पिक प्रस्तुतियाँ हैं किन्तु एक सीमा तक | 

अपने दुःख पर 'हाय-तौबा' करना सामान्य वृत्ति है, स्वयं के संतापों पर मुस्कुराना या हँसना दार्शनिक वृत्ति है किन्तु दूसरों की पीड़ा या पराजय पर हँसना हास्य का शिष्ट रूप नहीं |

प्रतियोगिता में प्रतिवादी को हारते देख या शत्रु को रणभूमि में पराजित होते देख उसमें अपने पक्ष के लोगों की आह्लादात्मक ध्वनियाँ भी एक सीमा तक शिष्टाशिष्ट दायरे से बाहर रखी जाती हैं ये तो मात्र उत्साहवर्धन का आनंद द्योतित रूप होती हैं | 

इस तरह 'होली' शब्द का ध्वन्यात्मक अर्थ स्पष्ट है :
ह+ओ+ल+ई (संताप प्रदर्शक ध्वनि + ध्यानाकर्षक ध्वनि + आह्लाद द्योतक + तीव्रता सूचक ध्वनि) 

होली पर्व पर प्रायः "होली हैSS, होली हैSS" ... का स्वर ... रंग उड़ाते, रंग लगाते, रंग मलते, रंग घोलते आदि आदि करते समय सुना जा सकता है |

होली पर व्यक्ति कर कुछ भी रहा हो मूलतः वह अपने मनस्ताप और शारीरिक तापों को दूर कर देना चाहता है. "होली है, होली हैSS,होली हैSS" की गूँज ... संतापों का हरण करने में सहायक है |

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

तनाव की तपन

कविता ने है कर दिया 
मेरा कंठ अवरुद्ध. 
भ्रष्ट राग गाता फिरा 
नहीं हुआ कुछ शुद्ध. 

नहीं हुआ कुछ शुद्ध 
तनाव की तपन झुलसता. 
सत्य सूर्य को आज़ 
भ्रष्ट बादल भी ग्रसता. 

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

तब ही वाणी तुझको स्वीकार करेगी


अय माँ! कहाँ पर मेरी शिक्षा होगी? 
है कौन पद्धति शिक्षा की उपयोगी? 

मैं जहाँ ब्रह्मचारी बनकर पढ़ पाऊँ. 
संयम मर्यादा शील धर्म अपनाऊँ.
मुट्ठी में कर लूँ मरण शरण किस जाऊँ? 
करनी से अपने ही सब क्लेश मिटाऊँ?

विकृत न सोच को होने दूँ व्यभिचारी. 
ना बसे कल्पना में आ नंगी नारी. 
किस तरह उचित-अनुचित का निर्णय लेकर 
मैं स्वयं बुद्धि को मथ लूँ अपने वश कर. 

गुरुकुल कोलिज का मुझको भेद बताओ. 
उलझे प्रश्नों को आप प्रथम सुलझाओ. 

क्या संयम से मुझको नव जोश मिलेगा? 
होकर विरक्त मुझको संतोष मिलेगा? 
या दमन इन्द्रियों का करके तन जर्जर 
हो जावेगा क्या ह्रदय नहीं निज बर्बर? 

क्या स्नेह नहीं तब उर को छील बहेगा? 
तब भी क्या उर संवेदनशील रहेगा? 
करुणा दीनों पर तब भी क्या उपजेगी? 
क्या क्रोध बुद्धि का तब ना नाश करेगी? 

क्या संन्यासी मन प्रेम नहीं करता है? 
अथवा विरक्त होकर खुद को छलता है? 
उर में ममत्व का ज्वार नहीं क्या उठता? 
अथवा ऊपर से शांत भीत से कुढ़ता? 

उर्वशी रूप पर मुग्ध हुआ योगी था? 
योगी था वा वासना त्रस्त रोगी था? 
उस विश्वमित्र का वंश बढाने वाले 
हैं बैठ गए बन योगी आश्रम वाले. 

किसके आगे ना खाई न पीछे गड्ढा? 
है कौन आश्रम नहीं अय्याशी अड्डा? 
पहले मठ होते थे पर अब आश्रम हैं? 
दाढी वाले बाबा भी किस से कम हैं? 

अब रहा कौन आदर्श आज गुरुकुल में. 
चेले बाहर गुरु अन्दर देखे फ़िल्में. 
श्लोकों की जगह आज गीतों ने ली है. 
मुख के द्वारा यह खुले आम केली* है. 

अब नहीं पद्धति गुरुकुल की भाती है. 
कोलिज की भी मन मेरा उचटाती है. 

मैं बदला कोलिज में जाने के कारण. 
बन गया लार्ड मैकाले का मैं चारण. 
संस्कृतनिष्ठ भाषा अपनी मैं भूला. 
श्लोकों का उच्चारण करना भी भूला. 

मैं भूल गया - मैं कौन देश का वासी. 
मैं भूल गया हूँ - नाम और क्या राशी. 
सभ्यता संस्कृति है क्या, भूल गया हूँ. 
पहचान हमारी है क्या, भूल गया हूँ. 

अब भेद नहीं मनुष्य-पशु में कर पाता*. 
क्या है सच अथवा झूठ नहीं कह पाता. 
परिभाषाओं ने रूप बदलकर अपना. 
मुझको असमंजस में डाला है इतना. 

कि भूल गया मैं पिछले आदर्शों को. 
गत भक्तिकाल तक के बीते वर्षों को. 
अब रीतिकाल ही मन पर छाया रहता. 
सबको नंगा करने को उत्सुक रहता. 

हर दृष्टिकोण मेरा अब अपराधी है. 
अब अर्धनग्न नारी भी मर्यादी है. 
क्या आग लगी है उर में मेरे भाई. 
मैं रसिकराज बनकर करता कविताई. 

मन आज मुझे ना जाने क्या-क्या कहता. 
नंगों को ही नंगा करने को कहता. 

मन को मैंने है लाख बार समझाया. 
कि नंग बड़ा परमेश्वर होता आया. 
यदि कर भी दूँ शब्दों से उनको नंगा. 
कर देंगे सारे नंगे कल को दंगा. 

मन बार-बार फिर भी मुझको उकसाता. 
मुझको कायर सामर्थ्यहीन बतलाता. 
किस तरह स्वयं के मन को मैं समझाऊँ. 
परिचय दूँ अपना अथवा चुप रह जाऊँ. 

या पकड़-पकड़कर सबको कर दूँ नंगा? 
दो थन वाले जीवों से कर लूँ पंगा? 
मॉडल बन नारी का अपमान करे जो. 
बेशरमी से अंगों का गान करे जो. 

माँ सरस्वती, बोलो अब तो कुछ बोलो. 
मेरी वाणी में सुधा नहीं विष घोलो. 
विष बुझे बाण सीधे मृत्यु देते हैं. 
अविलम्ब 'अभी' को 'गत' करवा देते हैं. 

मैं आज विवश होकर विषपान करूँगा. 
पर कंठ तलक ही विष को मैं रक्खूँगा. 
मेरी वाणी को सुन पापी तड़पेगा. 
अन्दर से मरकर बाहर से भड़केगा. 

पर, मैं क्योंकर उनसे डरने वाला हूँ. 
मैं कलम छोड़कर ना भगने वाला हूँ. 
दो आशी माता कलम सत्य ही बोले. 
बेशक कषाय कटु तिक्त सदा ही बोले. 
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नर शक्तिशाली होकर सुन्दरता पाता. 
दुष्कर्मों से लेकिन गुंडा कहलाता. 
हो यही नियम नारी पर भी अब लागू. 
'रंडी' बोलो ... यदि है नारी बेकाबू. 

तब गायें गाना 'हाय..हेलो.. लुग* बोलें.
रंडी है देसी शब्द ... ज़रा अब बोलें. 
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मद काम वासना की जिसमें भी अति है. 
यदि आज नहीं तो कल उसकी दुर्गति है. 
हो गया काम गुंडा, रति हो गयी रंडी. 
जिह्वा पर अब मेरे सवार है चंडी. 
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शारदे!  क्षमा, वाणी ने विष्ठा उगला. 
बन बैठा मानस हंस आज है बगुला. 
बगुले पर ही अब सरस्वती बैठेगी. 
ना बैठेगी तो ... कभी नहीं बैठेगी. 

यदि शरम शारदे, बगुले पर आती है. 
वीणा भी छूट धरती पर गिर जाती है. 
तो रण-चंडी का दुर्गा रूप धरो री! 
अपनी वीणा को शिव का शूल करो री! 

वध करो शूल से जो हो नर व्यभिचारी. 
वध करो शूल से तब तुम निर्लज नारी. 
विद्यादेवी ! ....  तब ही वसंत मानूँगा. 
तब ही अपनी साधना सफल जानूँगा. 

मन में तेरी तब जय-जयकार हुवेगी. 
तब ही वाणी तुझको स्वीकार करेगी. 

[मेरी शिकायत : मेरी पूजा]



बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

खाली पेट ना होए जुगाली


ममता के आँसू घड़ियाली 
मिली रेलवे की रखवाली 
लालू को दिखता बिहार था 
ममता को दिखता बंगाली.

सत्ता की साधना कर रहे 
आज़ लुटेरे, बनकर माली. 
सबने लूटा तरह-तरह से 
ममता की थ्योरी 'बदहाली'.

लालू 'गरीब-रथ' लेकर आये  
खाली पेट ना होए जुगाली. 
ममता ने भी सोचा अब तो 
'नक्सल-रथ' भी भालो चाली. 

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

ज़्यादा फेरे नहीं लगाओ


परिणय की इस वर्षगाँठ पर 
गृहस्थी की ग्रंथी सुलझाओ. 
अमित और दिव्या शर्मा जी 
ज़्यादा फेरे नहीं लगाओ. 

उलझ रही हैं आज़ स्वयं में 
जो भी बातें यहीं भुलाओ. 
प्रेम और विश्वास जताने 
ज़्यादा फेरे नहीं लगाओ. 

संतोष परम धन कहते साधु 
आशा का कुछ अंत न पाओ. 
एक और व्यापार जमाने 
ज़्यादा फेरे नहीं लगाओ. 

कभी बुलाओ अपने घर पर 
और कभी खुद आओ-जाओ. 
परिणय की इस वर्षगाँठ पर 
ज़्यादा फेरे नहीं लगाओ. 

रविवार, 30 जनवरी 2011

प्रेम नहीं प्रतिउत्तर चाहे


मुझे पता है नहीं मिलेगा 
मुझको कोई पुरस्कार.  
इसीलिए मन के दर्पण का 
करता हूँ ना तिरस्कार. 

जैसा लगता कह देता हूँ 
कटु तिक्त मीठा उदगार.
मित्रों को भी नहीं चूकता 
तुला-तर्क वाला व्यवहार.  

मुझको बंधन वही प्रिय है 
जो भार होकर आभार. 
प्रेम नहीं प्रतिउत्तर चाहे  
मिले यदि, 'जूते' स्वीकार. 


मंगलवार, 25 जनवरी 2011

अपशब्द युद्ध कैसे लडूँ?


कोई कर दे तर्क से मुझको पराजित. 
साक्ष्य संचित कर मुझे नीचा दिखाये. 
फिर भी अपने गुरुजनों के पास जाकर 
पक्ष-स्व मज़बूत करना सोचता हूँ. 

कोई भद्दे भाव की करके बुनावट. 
बहस करने को मुझे घर पर बुलाये. 
मौन रहता कायरों की भाँति तब तक 
गालियों की बिछी चादर हट न जाये. 

आज़ अपने ही मुझे कहते कुपोषित. 
मानते हैं वे मुझे शय्या-पसंदी. 
फटकार पर भी मैं उन्हें बेअसर दिखता 
सुधरती है नहीं आदत मेरी गंदी. 

विद्वता के सामने मैं झुक भी जाऊँ. 
कुतर्कियों से हाथ दो-दो आजमाऊँ. 
पर हमेशा भाग जाता पीठ दिखला  
जहाँ भाषा भील बनकर नाच करती. 

शनिवार, 22 जनवरी 2011

आज़ मंच पर रचना नहीं उसका प्रस्तुतीकरण प्रधान हो गया है


एक समय था जब राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन का अर्थ हुआ करता था 'राष्ट्रीय-जगराता'. उस रात कविगण रसिक श्रोताओं को राष्ट्र-रेम, राष्ट्र-भक्ति, सद्भावना, समानता, कर्मठता, नारी के प्रति सम्मान भावना का पाठ पढ़ाते थे. एक क्षण को भी श्रोता ऊँघने या अंगडाई लेने लगता था तो कार्यक्रम की असफलता समझी जाती थी. कवि-सम्मेलन के दो दौर चलना अनिवार्य था. दूसरे दौर का अंत अगले दिन के प्रारम्भ से होता था. दूसरा दौर तब तक चलता था जब तक श्रोता भोर में गाये जाने वाले पक्षियों का समूहगान [कलरव] न सुन लें. 

कवि-सम्मेलनों का पूरी-पूरी रात चलना और श्रोताओं का प्रत्येक कवि की बारी का इंतज़ार करते हुए उस कवि द्वारा परोसे जाने वाली साहित्यिक रचनाओं को जानने की जिज्ञासा अंत तक मंच से बाँधे रखती थी. यूँ तो गोष्ठियों में निराला जी की 'राम की शक्ति पूजा' लम्बी कविताओं को सुनने के लिये आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे धैर्यवान श्रोता ही अंत तक साथ देते हैं, पर ऎसी लम्बी कवितायें प्रारम्भ से ही मंच पर सफल नहीं रहीं, चाहे (निःसंदेह) उनका स्तर कालिदासीय गरिमा [उच्चस्थ कवियों] से ही मंडित ही क्यों न रहा हो. ऐसे में एक समय अंतराल के बाद श्रोताओं की प्रतिक्रियाओं से लगने लगता है कि वे ऊब रहे हैं; उठकर चहलकदमी करने लगना, परस्पर विषयेतर बातें करने लगना, आदि-आदि. हल्की-फुल्की गुदगुदाने वाली रचनाओं पर दिल खोलकर ठहाके लगाना. 

अधिकांश श्रोताओं की रुचिओं और उनकी बदली मानसिकता को ध्यान रखते हुए अब वैसे कवियों की माँग बढ़ गयी है जो वनमानुष-सी शकल बनाकर फूहड़ हास से श्रोता नहीं तमाशबीनों को हँसाने का दम रखते हों. श्रोता इसलिये नहीं कहा क्योंकि 'श्रोता' संज्ञा की भी कुछ गरिमा होती है. श्रोता होने के लिये भी कुछ स्वयं निर्धारित व मर्यादित शर्तों का पालन किया जाना चाहिए. इन सबके चलते आज़ मंच पर रचना नहीं उसका प्रस्तुतीकरण प्रधान हो गया है, जिनसे हास्य-व्यंग्य के अंतर्गत मजमा शैली और चुटकुला शैली दो नवीन शैलियों का प्रादुर्भाव देखने को मिल रहा है और साथ ही दूसरी रस की रचनाओं के अंतर्गत गीति और ग़ज़ल शैली प्रचान हो गयी है. 

मंचीय कविता के अंतर्गत मजमा और चुटकुला शैलियाँ नयी हैं. अन्यथा ये दोनों शैलियाँ भी काफी पुरानी हैं. दरबारी संस्कृति में दरबार के या कभी-कभी बड़े स्तर के कार्यक्रमों में प्रजा के मनोरंजनार्थ नट, बाजीगर, मदारी आदि तमाशा दिखाया करते थे. उसके अलावा कभी-कभी दरबार के ही बुद्धिमान लोग [तेनालीराम, वीरभद्र (बीरबल) जैसे] और आश्रित कविगण मनोविनोद निमित्त बड़े पदाधिकारियों से चुटकी लिया करते थे जिसे हम उस समय के चुटकुले कह सकते हैं. बातचीत के दौरान किसी को नीचा दिखा देना या किसी की अभिशंसा करना इस चुटकुला शैली की विशेषताएँ थीं जो आज भी बरकरार हैं. 

राष्ट्रीय कवि मैथिलीशरण गुप्तजी के विषय में 'थैली की शरण में गुप्त भावेन स्वीकारोक्ति' तत्कालीन विरोधी मन वाले कवियों के मध्य हास्य का विषय रही. [जिसका अर्थ : मैं थैली की शरण में गुप्त भाव से रहता हूँ.] खुद मैथिलीशरण जी के घर की एक घटना इस बात का खुला प्रमाण है कि औरों की निंदा में पहुँचे हुए विद्वान् भी आनंद लेते रहे हैं. 

एक बार अज्ञेय जी गुप्तजी के घर से नाराज होकर जाने लगे तो 
गुप्तजी ने रोका और पूछा "क्या हुआ, उठकर क्यों चल दिए?" 
अज्ञेय जी बोले "दद्दा! मैं आपके यहाँ अब कभी नहीं आऊँगा." 
गुप्तजी - "क्यों क्या हुआ?" 
अज्ञेय - "जहाँ हमेशा औरों की बुराइयों में रस लिया जाता हो, उस राष्ट्र कवि के घर ठहरने में मुझे लज्जा आती है." 
गुप्तजी हँसकर बोले - "अरे भई, निन्दारस से बढ़कर भी कोई रस है?... इसके पीछे हमारी कोई किसी से दुर्भावना नहीं रहती." 

और देखने में आया है कि निन्दारस प्रेम जब बढ़ते-बढ़ते दीवानगी का रूप ले लेता है तब रचना की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, उसका प्रस्तुतीकरण ही प्रधान हो जाता है. और तब लेती है मंचीय मजमा शैली और चुटकुला शैली. 'कवि' तब कवि कम मदारी अधिक लगने लगता है. आवाहन करता कवि नहीं डुगडुगी बजाता मदारी. क्यों सही कहा या गलत?

रविवार, 9 जनवरी 2011

एक कोड़े से करी पिटाई

एक कोड़े से करी पिटाई 
दर्द इसी का है दुःखदाई. 
आगे क्रोध-कुंड है मेरे 
पीछे छल-भावुकता खाई. 

एक पंक्ति में खड़े कर दिए 
दुश्मन और मुँहबोले भाई. 
धूर्त और मक्कार निकलते 
है कैसी ये न्याय-तुलाई? 

खुद का दुःख है पाँव फैलाता 
बन जाता है ताड़ की नाईं. 
और हमारा सिमट गया तो 
समझ लिया सूखी मृत राई. 

जिन पैरों न पड़े बिवाई
वो क्या जाने पीर पराई. 
जो उनके मन का सोचा है 
वही सत्य-पथ, शेष खटाई. 

कोड़ा अलग ले लिया होता 
पी जाते सब तिक्त दवाई.
एक कोड़े से करी पिटाई 
दर्द इसी का है दुःखदाई. 

बुधवार, 5 जनवरी 2011

व्यर्थ निंदा लाभकारी

अये सुनारी! 
व्यर्थ निंदा लाभकारी. 
बन गए हैं जो प्रचारक 
अवगुणों के शोधकर्ता 
धूमकेतु भाँति वे भी 
अयन का अधिकार पाने 
लगाने दो उन्हें चक्कर 
धुल धुआँ युक्त डग्गर. 

अये सुनारी! 
दुष्ट भी तेरे पुजारी. 
कर रहे हैं रात और दिन 
तुझ से नाता जोड़ने को 
औघड़ों की भाँति वे भी 
अर्चना अधिकार पाने 
मारने दो टोना-मंतर.
मांस मदिरा पकड़ खप्पर. 

_________________
शब्दों से तात्पर्य : 
अयन — गमन, गति,  चाल, प्रायः पिंडों की गोलाकार गति के लिए प्रयुक्त होता है.
डग्गर — हिंसक पशु, खूंखार जानवर.
औघड़ — फूहड़, अघोरपंथी, जो विपरीत क्रियाओं के द्वारा भक्ति का आडम्बर कर्ता है. 
खप्पर — खोपड़ीनुमा भीख माँगने का पात्र. 


गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

नया साल आया

विप्रा ने .... गौरव से ...
इन्टरनल जोब्स के ज़रिये 
पिछड़ी जातियों के लिये
प्रमोशन का द्वार खुलवाया. 
............ नया साल आया. 

गज़न्फर ने आशीष के ...
........ कान में ..... धीरे से
..... जल्दी सफलता का
....... प्रेरक प्रसंग सुनाया
............ नया साल आया.

देवब्रत ने 
विप्रा के सामने 
पर्सनल इमोशन का ....
....... मेघ-मल्हार गाया 
............ नया साल आया.

योगिता और नेहा ने ...
....... जाटों की स्टडी में
'अरुण कुमार' को
'किंग ऑफ़ क्वेरी' बताया. 
............ नया साल आया.

सीनियर सुधीर ने ...
जूनियर सुधीर से ...
..... टॉयलेट रजिस्टर में 
ओरिजनल नेम बदलवाया 
............ नया साल आया.

रियाज़ ने 
नरेश के हाथ में 
फिक्स डिपोजिट हो जाने पर 
करेंसी ज़मा न कर पाने का 
कम्यूनी- 'कोशन' पेपर थमाया 
............ नया साल आया.

अर्चना ने सुब्रातो को ....
सुबह की शिफ्ट का 
हेल्थ-फायदा बताया 
............ नया साल आया.

पवन ने 
बर्थ-डे कलेक्शन पर 
कोटेश को खुश करने को 
५०% इनकम-टेक्स लगाया 
............ नया साल आया.

हरप्रीत ने चनदीप से 
गठिया दर्द वाली स्टडी के समय 
ऑफिस आने से पहले 
एक्सेस कार्ड एक्सेस करवाया 
............ नया साल आया. 

एक ही समय में 
दो दफ्तरों में 
इकलौता मुर्गा 
जोर से चिल्लाया. 
............ नया साल आया. 

दीपा ने 
पुराने डीओज को 
उनकी भावी टीमलीड का 
................ दर्शन कराया. 
............ नया साल आया.

हरीश ने 
बॉस की बात को 
समझ में आने से पहले 
'हाँमी' में गर्दन को 
ऊपर से नीचे हिलाया 
............ नया साल आया. 

संतोष के ऊपर 
शाम सात बजे 
विनीता मेडम के 
बिहारी भूत ने 
अपना कब्जा जमाया 
............ नया साल आया. 

कुलदीप ने 
प्रमोशन के आशा-दीपक में 
अपना पूरा तेल गिराया 
............ नया साल आया.

चंदर ने 
झल्लाहट में 
कुर्सी पर बैठकर 
लंबा पाँव फैलाया 
............ नया साल आया.

विजय कुमार ने 
अपना डेज़ीग्नेशन 
'CRF डिज़ाइनर' बताया 
खुद की नज़रों में 
अपना महत्व बढाया. 
............ नया साल आया.

विजयालक्ष्मी मेडम ने 
अपने ऑफीशियल टाइम को 
रबड़-बेन्ड बनाया. 
............ नया साल आया. 

और मैंने 
अपने कनवेंस फॉर्म में 
महीने दर महीने 
होम और ऑफिस के बीच 
किलोमीटर डिस्टेंस बढाया 
............ नया साल आया.

[भाग-1]

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

दबी गुहार करो स्वीकार


ईश्वर सबके कष्ट हरो!
छुआछूत में नहीं पड़ो! 

यदि कान हैं तेरे पास 
उनको मेरी ओर करो! 
सुनकर सबके कष्ट हरो!

नहीं चाहिए मुझको कुछ भी 
तुम अपना आराम करो! 
चढ़ा चढ़ावा बैंक धरो। 

तुम पर है विश्वास हमारा 
बेशक तुम संदेह करो! 
संकटमोचक बने फिरो। 

रविवार, 12 दिसंबर 2010

श्वेतिमा-सौंदर्य

सुन ली है मैंने
आपकी धड़कन
ह्रदय की.

भीड़ इतनी थी
कि बस में
कान मेरा
(सीट बैठे ) छू रहा था
वक्ष तेरा
आप ठाड़े पास में थे.

बोलते थे आप शायद
"सीट आरक्षित हमारी"
गाड़ियों का शोर
'पौं- पौं'
हो रहा था
नहीं पडता था सुनाई.

मैं विफलता शौक में था
शून्यता के लोक में था
सोचता था –
'भाग्य मेरा
साथ देता क्यों नहीं है'

"नहीं आती शर्म तुझको
बेशरम, बन ढीठ बैठा." –
खड़ा कर देने का 'दम'
उस कर्कशा आवाज़ में था.

हलक सूखा
लग रहा था
मीन मुख में
फँस पड़ा हो कोई 'काँटा'.

हाथ दोनों में से मैंने
एक टाँगा
हेंगर की भाँति ऊपर
और टेका दूसरा
सीट के डंडे के ऊपर
जहाँ पहले से धरे
दो हाथ चिकने
और उनपर केश बिखरे
लालिमा ले बाल काले.
झाँकता था श्वेत सुन्दर
बाल उनसे चमचमाता.
और मुझको था कराता
ज्ञान उसकी अवस्था का.

मेरे उठते सीट से ही
हो गई थी सीट के ही
गिर्द हलचल.
किन्तु मेरा ध्यान उसके
श्वेत कच की ओर ही था.
पा रहा था स्वयं को मैं
श्वेत कच की भाँति
छूटा  -- बिन पुता.

हो गए हैं शेष काले
बाल वो भी लालिमा ले.
देख उनको याद आते क्लास वाले.
मेरी दृष्टि खोजती उनकी सफेदी.
और खुद की श्वेतिमा पर
करती अश्रुपात जमकर.

जड़ हुआ मस्तिष्क, लेकिन
प्रश्न अब भी कर रहा है :
"कौन कब आकर करेगा,
श्वेतिमा-सौन्दर्य को
मौलिक कसौटी पर कसेगा?"


मंगलवार, 30 नवंबर 2010

नवोदित शिक्षाविदों की घबराहट बेवजह है

किसी भी दूसरे के विचारों से अथवा पहले की सूचनाओं से लाभ लेने के लिये प्रायः दो माध्यमों का प्रयोग करते रहे हैं. एक श्रुति परम्परा वाला और दूसरा पाठ पद्धति वाला. 

मनुष्य अपने बाल समय से ही जिज्ञासु रहा हि. उसे श्रुति परम्परावाला मेथड शुरू से अच्छा लगता रहा है. दादा-दादी, नाना-नानी या कभी-कबाह माँ-पिताजी से भी ... काफी पुराने समय से 'वह' किस्से-कहानियों के लोभ में चिपकता रहा है. घर के बड़े-बूढों का लाड़ला कहानियाँ सुन-सुनकर आत्मीयतावश उनका इतना बड़ा हिमायती और आज्ञाकारी हो जाता है कि वह दो पीढ़ियों के विवादों में बुजुर्गों के टोल में शामिल मिलता है. 

प्रारम्भ में चित्रों वाली पुस्तकें आदि के प्रति वह खिंचता है. चित्र उसे समझ में आते हैं क्योंकि उन्हें वह देखता है महसूस करता है. लेकिन पढ़ने के प्रति बच्चे का रुझान नहीं होता क्योंकि वह पढ़ना जानता ही नहीं उसे वह मेहनत से सीखता है. चित्रों की भाषा तीन-चार सालों में उसकी विकसित हो चुकी होती है क्योंकि माता के स्तनों का पान करते-करते वह भाव-भंगिमाओं का पंडित बन गया होता है. बच्चा बहुत अच्छे से माँ और गोदी में उठानेवाले परिवार के अन्य सदस्यों के ... अच्छे-बुरे, डांट के, प्यार के, ममता के, हँसी के, रोने के भावों को समझने लग जाता है. और इसी कारण भावों से जुड़े चित्रों को वह भली-भाँति समझता है. देखा गया है कि कई बच्चे तो चित्रों को देख-देखकर अपनी कहानी भी बनाने लगते हैं. 

जहाँ तक 'रटंत विद्या' की बात है वह दोहरावट पद्धति पर आधारित है. इसका अलग माहात्म्य है. वह किसी के चाहने से समाप्त होने वाली नहीं है. रुचि और अरुचि वाले विषयों को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से पढ़ने की विवशता को परीक्षा के दिनों में 'रटंत विद्या' या दोहरावट पद्धति ही परीक्षा-सागर से पार लगाती रही है. 

आज बाल शिक्षाविदों द्वारा 'पहचान शिक्षा पद्धति' की ओर प्रारम्भिक शिक्षा माध्यम से बालकों को ले चलने का प्रयास बेशक नया नहीं है. लेकिन वर्तमान में सराहनीय अवश्य है. पहचान वाली वस्तुओं और भावों से जोड़कर यदि अक्षरमाला और अन्य बातों को समझाया जाएगा तो बच्चा सहजता से बातें ग्रहण करेगा. बच्चे की जिज्ञासा पहचान के अलावा चीज़ों के प्रति भी हो सकती है जैसे परीकथाओं में. इसमें वह दो चीज़ों को जोड़कर कल्पना कर सकता है — बहन, माँ या आंटी के साथ उड़ते पक्षी को जोड़कर एक परी की कल्पना. 

दूसरे, 'क' से कबूतर या कमल सिखाना ग़लत नहीं कहा जा सकता. ना ही ए फॉर एप्पल बताना ग़लत है. बच्चा इस तरीके से 'क' अक्षर को कबूतर के 'क' के रूप में जानेगा — यह कहना पूरी तरह सही नहीं. इस तरह के बच्चों का अनुपात काफी कम है. यदि मान भी लिया जाये बच्चा 'क' अक्षर को कमल या कबूतर के 'क' रूप में पहचान रहा है तो इससे बछा कौन-सी ग़लत दिशा पकड़ रहा है? यह बच्चे की प्रारम्भिक स्टेज है इसमें बेसिक चीज़ों को बच्चे में भरना पहली जरूरत है न कि सही-ग़लत में पड़ना. यदि ग़लत चीज़ों को नकारना ही है तो निरर्थक शब्दों को भी सिरे से नकारा जाये. जैसे बाल कविताओं में निरर्थक शब्दों की भरमार देखी जाती है फिर भी वे पसंद की जाती रही है. उदाहरण कुछ कविताओं में बेतुके किन्तु गीतिमय शब्द भरे पड़े हैं — सन पकैया, सन पकैया ....., ईलम डीलम ..., आदि आदि ... अन्य उदाहरणों की खोज करनी है तो प्रसिद्ध कवि एवं बाल गीतकार दीनदयाल शर्मा जी के साहित्य में की जा सकती है. 

मतलब यह है कि बच्चा अक्षरमाला जैसे भी सीखे लेकिन वह धीरे-धीरे इस काबिल स्वयं हो जाएगा कि अक्षरमाला के अक्षरों को आदि, मध्य और अंत की स्थिति में आने पर पहचान लेगा और उनका उच्चारण विधान समझ पायेगा. इस सन्दर्भ में शिक्षाविदों की घबराहट बेवजह है. 

[उत्प्रेरक - प्रवीण त्रिवेदी जी, http://primarykamaster.blogspot.com/]




बुधवार, 24 नवंबर 2010

माइन है तो ..............फाइन है

[मेरा है तो अच्छा है]

एक विचारक थे ठीक अमित शर्मा जी की ही तरह. पर वे वर्तमान अमित जी से दो कदम आगे की सोच के थे.   वे मांसाहार करना बुरा नहीं मानते थे. वे केवल बलात्कार को बुरा समझते थे. 
इसलिये उन्होंने इस दुष्कर्म पर प्रतिबंध लगाने को पुरजोर कोशिशें कीं. बलात्कार समर्थकों से बड़ी तार्किक बहस भी की. लेकिन वे उन्हें किसी भी तरह से समझा नहीं पाए. 
बलात्कार समर्थक उसे अपने-अपने धर्मों का आधार कहते थे. वे सभी उस कृत्य को अपनी इच्छा न कहकर परमसत्ता की आज्ञा बताया करते थे. उन्होंने अपने-अपने सुन्दर तर्कों से कुरूप-सी परिभाषायें भी गढ़ लीं.   अमित से दो कदम आगे चलने वाले उन सज्जन ने  अपनी अंतिम कोशिश में अपने ब्लॉग पर दो वीडिओ लगाए. 

पहला वीडिओ ...... 

स्त्री के साथ एकाकी दुष्कर्म का. और 



दूसरा वीडिओ ..... 

अबोध कन्या के साथ सामूहिक दुष्कर्म का. 


______________________________________________________
विरोधियों और समर्थकों ने टिप्पणियाँ दीं : 

१ ] प्रो. बाल की खाल —
आप सौहार्द भंग करने की कोशिश करते हैं जनाब. अपने शास्त्रों में देखिये कितने ही महापुरुषों ने यह सात्विक कार्य किया है 
— रावण ने सीता का हरण किसलिये किया था. जबकि रावण एक वेद-विद्वान् और महापंडित था. [देखें : पंडित खर और दूषण द्वारा रचित 'रावायण', सात्विक बलात  काण्ड, पृष्ठ ३-१३]
— द्रोपदी का चीर हरण करने वाले कौरव राजवंश के लोग थे जिनकी शक्ति के समक्ष पांडव भी अपना मुँह नहीं खोल पाए. [देखें : शिखंडी रचित महाभारत, चीर-हरण पर्व, पृष्ठ ९-२-११] 
अतः आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप इस तरह इस परमसत्ता 'अगाओ' के नेक कर्म के प्रति बदनीयत भावनाएँ न भड़काएँ. यह आपके लिये भी अच्छा होगा. आप इस नेक राह पर चलेंगे तो जन्नत में हूरें आपका इंतज़ार करेंगी. ऐय्याशी को बुरा न ठहराएँ. आप जानते नहीं हैं कि ऐश्वर्य से ही ऐय्याशी बना है. थोड़ा समझदारी पूर्ण परिचय दें. 
________
अगाओ — 'अ' से अल्लाह; 'गा' से GOD, 'ओ' से ओउम 

Time: 2:00AM, 24 November, 2010 Wednesday

२] महाशय मासूम —
आपने इंसानियत से जुदा हरकत की है. आपको कोई हक़ नहीं कि सृष्टि चलाने वाले नियामक कर्म को ही बदनीयत करार दिया जाये. हम तो इस प्रक्रिया से अभ्यास करते हैं प्रजनन सबंधी क्रियाओं का. 

Time: 2:40AM, 24 November, 2010 Wednesday

३] बेनाम भाईजान —
आप खुद तो नामर्द हो कोई दूसरा मर्दानगी का परिचय देता है तो आपके गले नहीं उतरता. 

Time: 4:30AM, 24 November, 2010 Wednesday

४] भाई खूब कही —
आपने एकदम सही कहा. 

Time: 5:31AM, 24 November, 2010 Wednesday

५] मनोभाव-शून्य —
मुझे समझ नहीं आता कि आप इस तरह के मसलों को क्यों उठाते हैं. अरे यह तो व्यक्तिगत इच्छाएँ हैं. आपको गूगल में पोर्न साइट्स नहीं दिखायी देतीं वहाँ तो इस तरह के तमाम वीडिओ भरे पड़े हैं. आप इन दो वीडिओ पर ही हाय-तौबा मचाये हुए हो. 

Time: 6:43AM, 24 November, 2010 Wednesday

६] मौसम ठीक है — 
मैं इस पर कुछ नहीं कहूँगा. 

Time: 7:13AM, 24 November, 2010 Wednesday

७] बिस्तर लगा है — 
मुझे आपने सोचने पर मजबूर कर दिया है. 

Time: 8:32AM, 24 November, 2010 Wednesday

८] डॉ. मीनमेख 
जब भी इस तरह की पोस्ट कोई मेरी नज़र से होकर गुजरती है. मैं उसे पसंद नहीं करता. आप ध्यान दें तो पायेंगे कि हर कहीं तो चीर खींचने में लगे हैं लोग. 
एक शायर ने क्या खूब कहा है : 
जब भी वे मिलने आते हैं मुझसे. 
मेरा अंदरूनी मन उन्हें दबोच लेना चाहता है. 
............ 
आपने मेरी टिप्पणी पिछली बार मोडरेट कर दी थी. 
आपसे टिप्पणी मोडरेट करने की उम्मीद अभी भी बरकरार है. 


Time: 9:55AM, 24 November, 2010 Wednesday

९] टीन-कनस्तर 
अच्छी प्रस्तुति. 
मेरे ब्लॉग पर पधारें. लिंक : teenkanastar.blogspot.com/


Time: 11:32AM, 24 November, 2010 Wednesday

१०] डॉ. उत्तमौत्तम 'बिना-अंकुश' 
मुझे आपसे कोई लेना-देना नहीं. आप जो कर रहे हैं मानव हित में है. इसलिये आप मेरे संगठन के आजीवन सदस्य बनें. आपमें जज्बा है इस जज्बे को ख़त्म न होने दें. 
तुरंत कदम उठायें. 

डॉ. उत्तमौत्तम 'बिना-अंकुश' 
दलित-मोचन सेना 
राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारत 
फोन : 000-00000000; फेक्स : 000-00000000
मोब: 00-0000000000


Time: 12:23PM, 24 November, 2010 Wednesday






बुधवार, 17 नवंबर 2010

रहम करो परवरदिगार

मुझे बचाओ ..... मुझे बचाओ 
............ चीखें आती कानों में 
लेकिन उन चीखों की .. ऊँची 
........... कीमत है दुकानों में.


अल्लाह किस पर मेहरबान है 
........ समझ नहीं है खानों में. 
ईद मुबारक ..... ईद मुबारक 
.......... बेजुबान की जानों में.


रहम करो ...... परवरदिगार 
पशु कत्लगाह - ठिकानों में. 


क़त्लो-ग़ारत ख़ुद करे , मज़हब का ले' नाम !

ज़ुल्म-सितम का कब दिया अल्लाह ने पैग़ाम ?!

अल्लाह तो करते नहीं कभी ख़ून से स्नान !


करे दरिंदे-जानवर ,या शैतान-हैवान !! 



— राजेन्द्र स्वर्णकार 


रविवार, 7 नवंबर 2010

मेरे यहाँ एक रिक्ति है जूते पोलिश करने की

ओबामा !
आपका
भारत में सु-आगत है.
हम जानते हैं कि
आपने काफी हथियार
पाकिस्तान को बेचे
मदद की हमेशा
उसके बुरे वक्त में
अब क्या बुरे वक्त में वह तुम्हारा साथ नहीं देगा?
आतंकी शिविरों में जिहादियों की हमेशा उसे ज़रुरत रहती है.
आप अपनी बची-खुची पूँजी को वहाँ इन्वेस्ट कर सकते हो.
अभी सुनहरा अवसर है, वह जोह रहा है रास्ता किसी बड़े स्पोंसर का.
अभी भी आप उसकी नज़रों में बड़े का ओहदा रखते हैं.

खैर, आपके बड़प्पन का कद भारत में भी छोटा नहीं हुआ है.
आप अगर अपने निवेशकों के लिए सम्मान की नौकरी चाहते हैं तो
मेरे यहाँ एक रिक्ति है जूते पोलिश करने की. मासिक वेतन १००० रुपये होगा.
यहाँ नये छोटे कर्मचारी को यह भी बड़ी मुश्किल से मयस्सर है.
इस विचार को आप मेरी रहम ना समझना
यह विचार तो
'श्रीराम सेतु में योगदान देने वाली
गिलहरी की प्रेरणा से आया है.
हमारी संस्कृति में अतिथि को खाली हाथ लौटाना
असभ्यता मानी जाती है.
अतः हम पिछली सभी कटुताओं को भुलाकर
फिर से नये रिश्ते बनाने की भूल करते हैं.
आपकी धरती की गंध हमारी मिट्टी की गंध में इस कदर मिल चुकी है कि
कोई नहीं जान पायेगा आपके उन मंसूबों को जो घोर स्वार्थ की सड़ी गंध से
हमारी सांस्कृतिक शिष्टताओं को नाक-मुँह सिकौड़े भगाने को विवश किये है.
चाहता हूँ कि सभी सामर्थ्यवान
कम-से-कम सहयोग की भाषा तो बोलें.
क्या मैंने जूते पोलिश का ऑफर देकर बुरा किया ?
क्या ताउम्र भारतीय ही दूसरे देशों में जाकर छोटे समझे जाने वाले जॉब करता रहेगा ?
क्या होटल मेनेजर के लिए गोरी चमड़ी और बर्तन माजने के लिए काली चमड़ी फिक्स है ?
क्या उनके प्रतिबंधों को हम तो आदर दें और
अपनी ही ज़मीन पर उनकी सुरक्षा-व्यवस्था को प्रतिबंधित कर पाने की हिम्मत भी न कर पायें?
मैं क्या करूँ ?
मैं क्यों नहीं पचा पा रहा हूँ ओबामा के आने को ?
हे ईश्वर! मेरे मन में सभी के लिए प्रेम क्यों नहीं भरता ?

बुधवार, 3 नवंबर 2010

स्मृति-झलक



मैं ब्लॉग जगत के उन सभी कैदियों की बारी-बारी स्मृति-झलक दिखाये देता हूँ जिनसे मेरी आत्मीयता है. 
जब मैंने अपनी पहली रचना डाली तो मुझे पता नहीं था कि 
— पोस्ट वाली जगह के नीचे कमेन्ट बॉक्स का क्या रोल है.
— इसे लोग पढेंगे भी या नहीं.
ऑफिस के साथी इन्दर कुमार जी ने मेरा ब्लॉग बनाने में सहयोग किया. 
ऑफिस में लंच के समय चोरी से ब्लॉग बनाया गया. "काव्य थेरपी" 
जब भी समय मिलता तो कुछ-न-कुछ ब्लॉग पर डालने लगा. 
लेकिन एक दिन क्या हुआ कि प्रशंसा से सनी एक टिप्पणी आ गयी और मैं बुरी तरह घबरा गया. 
मैंने पूरी पोस्ट ही डिलिट कर दी. कई दिन परेशान रहा.
तब ब्लॉगजगत और चिट्ठाजगत को चोरी-छिपे जानने और समझने में लगाए. 

खैर धीरे-धीरे कई बातें जान गया और आज भी मुझे इसकी कई सुविधाओं की जानकारी अमित शर्मा, दीपचंद पाण्डेय और अब कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ श्री सतीश सक्सेना जी देते रहते हैं. 
प्रारम्भ में राज भाटिया और समीर लाल जी ने मुझे प्रोत्साहित किया और मैंने उन्हें जाना लेकिन उनके ब्लॉग पर नहीं गया. बाद में जाना जो टिप्पणी करते हैं उनके अपने-अपने ब्लॉग भी होते हैं. 

इन सभी स्व-अनुभवों से पहले मेरे नाम वाले ब्लॉग को कोन्स्टेबल सुमित प्रताप सिंह ने बनाकर मुझे बताया था और उसके फायदे बताये थे लेकिन "जब तक स्वयं धारा में नहीं कूदते तैरना नहीं आता". सो धीरे-धीरे मित्रों की मदद से मैं ब्लॉगजगत में बढ़ता गया. 
अब मुझे महसूस ही नहीं होता कि मेरा दायरा एक अंकीय ही है. मेरा परिचय दो अंक तक बढ़ गया है और शायद भविष्य में तीन-चार अंक भी छू ले. 

मैं नाम लेकर अपने कुछ परिचितों को मंगल कामनाएँ देना चाहता हूँ. 
— महामूर्खराज नाम से लिखने वाले, सभी के लिये प्रेम रखने वाले मुकुल अग्रवाल जी 
— खयालों के कूप में रहने वाले हरदीप सिंह राणा 'कुँवर' जी 
— ब्लॉग लेखन में निरंतरता की मेरी प्रथम प्रेरणा दिलीप सिंह जी 
— बिंदास भावेन सम्पूर्ण समीक्षात्मक वार्ता करने वाले रोहित जी 
— खासतोर पर नवजात ब्लोगरों को सामान्यतः सभी को ऊर्जा देने वाले समीर लाल जी 
— अपनी कविताई से माँ सरस्वती और माँ भारती की सेवा में लगे संजय भास्कर जी, 
— अपने बडप्पन की छाया देने वाले श्री अरविन्द जी 
— व्याकरणिक त्रुटियों पर ध्यान दिलाने वाली हरकीरत जी 
— अपनी रचनाओं से मंत्रमुग्ध करने वाले अविनाश चन्द्र जी 
— संस्कृत पठन-पाठन का संकल्प लिये ब्लॉग जगत में बढ़ने वाले श्री आनंद पाण्डेय जी 
— स्वयं को कुटिल खल कामी कहकर दूसरों के लिये कहने को कुछ न छोड़ने वाले संजय जी  
— कभी ना खाली होने वाले अपने तरकश से कविता के पैने तीर चलाने वाले स्वर्णकार राजेन्द्र जी 
— प्रायः सही आकलन कर अंक देने वाले अनचाही बहसबाजी में नाराज हुए उस्ताद जी 
— 'मुझे भी खिलाओं नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे' वाली तर्ज पर आये अंग्रेजी के अध्यापक डॉ. जितेन्द्र जौहर जी.... [मजाक किया है बुरा ना मानियेगा जितेन्द्र जी] 
— बहुत अनुनय-विनय वाली कविताओं के बाद दर्शन देने वाले और अपनी बुद्धिमत्ता से प्रभावित करने वाले मेरे नवल प्रेरणा स्रोत +
— स्वसा दिव्या जी 
— धर्मध्वजा लेकर बढ़ने वाले और मुझे भी अपनी टोली में शामिल कर लेने वाले श्री अमित शर्मा जी 
— अपने विविध और आधुनिकतम विचारों से भिगोने वाले मेरे बचपन के साथी श्री दीपचंद पाण्डेय जी, 
— मेरी पाठशाला के फाउंडर मेंबर और मोनिटर हंसराज सुज्ञ जी 
— पाठशाला में प्री-नर्सरी के संजय जी और आउटर स्टुडेंट नरेश जी 
— विचारों को तर्क से ग्रहण करने के हिमायती शेखर सुमन जी 
— घर को मन में बसाए नगर में दिन बिता रहे देव कुमार झा जी 
................. और वे सभी जिनसे अभी जुड़ना शेष है इस दीपावली को मैं उनके नाम से अपनी स्मृति में प्रेम के दीप जला रहा हूँ.  

वैसे तो कई अन्य भी हैं जो मेरी स्मृति में ऊँचे आसन पर बैठे हैं वे इतने ऊँचे बैठे हैं कि वे प्रायः उनको मुझसे संवाद करना याद नहीं रहता. त्यौहार वाले दिन भी नहीं. उन्हें मेरा चरण स्पर्श. क्योंकि उनके चरण ही दिखायी दे रहे हैं. 

मेरे पाठक मेरे आलोचक

Kavya Therapy

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
नयी दिल्ली, India
समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.