मुझे बचाओ ..... मुझे बचाओ
............ चीखें आती कानों में
लेकिन उन चीखों की .. ऊँची
........... कीमत है दुकानों में.
अल्लाह किस पर मेहरबान है
........ समझ नहीं है खानों में.
ईद मुबारक ..... ईद मुबारक
.......... बेजुबान की जानों में.
रहम करो ...... परवरदिगार
पशु कत्लगाह - ठिकानों में.
क़त्लो-ग़ारत ख़ुद करे , मज़हब का ले' नाम !
ज़ुल्म-सितम का कब दिया अल्लाह ने पैग़ाम ?!
अल्लाह तो करते नहीं कभी ख़ून से स्नान !
करे दरिंदे-जानवर ,या शैतान-हैवान !!
— राजेन्द्र स्वर्णकार
बुधवार, 17 नवंबर 2010
रविवार, 7 नवंबर 2010
मेरे यहाँ एक रिक्ति है जूते पोलिश करने की
ओबामा !
आपका
भारत में सु-आगत है.
हम जानते हैं कि
आपने काफी हथियार
पाकिस्तान को बेचे
मदद की हमेशा
उसके बुरे वक्त में
अब क्या बुरे वक्त में वह तुम्हारा साथ नहीं देगा?
आतंकी शिविरों में जिहादियों की हमेशा उसे ज़रुरत रहती है.
आप अपनी बची-खुची पूँजी को वहाँ इन्वेस्ट कर सकते हो.
अभी सुनहरा अवसर है, वह जोह रहा है रास्ता किसी बड़े स्पोंसर का.
अभी भी आप उसकी नज़रों में बड़े का ओहदा रखते हैं.
खैर, आपके बड़प्पन का कद भारत में भी छोटा नहीं हुआ है.
आप अगर अपने निवेशकों के लिए सम्मान की नौकरी चाहते हैं तो
मेरे यहाँ एक रिक्ति है जूते पोलिश करने की. मासिक वेतन १००० रुपये होगा.
यहाँ नये छोटे कर्मचारी को यह भी बड़ी मुश्किल से मयस्सर है.
इस विचार को आप मेरी रहम ना समझना
यह विचार तो
'श्रीराम सेतु में योगदान देने वाली
गिलहरी की प्रेरणा से आया है.
हमारी संस्कृति में अतिथि को खाली हाथ लौटाना
असभ्यता मानी जाती है.
अतः हम पिछली सभी कटुताओं को भुलाकर
फिर से नये रिश्ते बनाने की भूल करते हैं.
आपकी धरती की गंध हमारी मिट्टी की गंध में इस कदर मिल चुकी है कि
कोई नहीं जान पायेगा आपके उन मंसूबों को जो घोर स्वार्थ की सड़ी गंध से
हमारी सांस्कृतिक शिष्टताओं को नाक-मुँह सिकौड़े भगाने को विवश किये है.
चाहता हूँ कि सभी सामर्थ्यवान
कम-से-कम सहयोग की भाषा तो बोलें.
क्या मैंने जूते पोलिश का ऑफर देकर बुरा किया ?
क्या ताउम्र भारतीय ही दूसरे देशों में जाकर छोटे समझे जाने वाले जॉब करता रहेगा ?
क्या होटल मेनेजर के लिए गोरी चमड़ी और बर्तन माजने के लिए काली चमड़ी फिक्स है ?
क्या उनके प्रतिबंधों को हम तो आदर दें और
अपनी ही ज़मीन पर उनकी सुरक्षा-व्यवस्था को प्रतिबंधित कर पाने की हिम्मत भी न कर पायें?
मैं क्या करूँ ?
मैं क्यों नहीं पचा पा रहा हूँ ओबामा के आने को ?
हे ईश्वर! मेरे मन में सभी के लिए प्रेम क्यों नहीं भरता ?
आपका
भारत में सु-आगत है.
हम जानते हैं कि
आपने काफी हथियार
पाकिस्तान को बेचे
मदद की हमेशा
उसके बुरे वक्त में
अब क्या बुरे वक्त में वह तुम्हारा साथ नहीं देगा?
आतंकी शिविरों में जिहादियों की हमेशा उसे ज़रुरत रहती है.
आप अपनी बची-खुची पूँजी को वहाँ इन्वेस्ट कर सकते हो.
अभी सुनहरा अवसर है, वह जोह रहा है रास्ता किसी बड़े स्पोंसर का.
अभी भी आप उसकी नज़रों में बड़े का ओहदा रखते हैं.
खैर, आपके बड़प्पन का कद भारत में भी छोटा नहीं हुआ है.
आप अगर अपने निवेशकों के लिए सम्मान की नौकरी चाहते हैं तो
मेरे यहाँ एक रिक्ति है जूते पोलिश करने की. मासिक वेतन १००० रुपये होगा.
यहाँ नये छोटे कर्मचारी को यह भी बड़ी मुश्किल से मयस्सर है.
इस विचार को आप मेरी रहम ना समझना
यह विचार तो
'श्रीराम सेतु में योगदान देने वाली
गिलहरी की प्रेरणा से आया है.
हमारी संस्कृति में अतिथि को खाली हाथ लौटाना
असभ्यता मानी जाती है.
अतः हम पिछली सभी कटुताओं को भुलाकर
फिर से नये रिश्ते बनाने की भूल करते हैं.
आपकी धरती की गंध हमारी मिट्टी की गंध में इस कदर मिल चुकी है कि
कोई नहीं जान पायेगा आपके उन मंसूबों को जो घोर स्वार्थ की सड़ी गंध से
हमारी सांस्कृतिक शिष्टताओं को नाक-मुँह सिकौड़े भगाने को विवश किये है.
चाहता हूँ कि सभी सामर्थ्यवान
कम-से-कम सहयोग की भाषा तो बोलें.
क्या मैंने जूते पोलिश का ऑफर देकर बुरा किया ?
क्या ताउम्र भारतीय ही दूसरे देशों में जाकर छोटे समझे जाने वाले जॉब करता रहेगा ?
क्या होटल मेनेजर के लिए गोरी चमड़ी और बर्तन माजने के लिए काली चमड़ी फिक्स है ?
क्या उनके प्रतिबंधों को हम तो आदर दें और
अपनी ही ज़मीन पर उनकी सुरक्षा-व्यवस्था को प्रतिबंधित कर पाने की हिम्मत भी न कर पायें?
मैं क्या करूँ ?
मैं क्यों नहीं पचा पा रहा हूँ ओबामा के आने को ?
हे ईश्वर! मेरे मन में सभी के लिए प्रेम क्यों नहीं भरता ?
बुधवार, 3 नवंबर 2010
स्मृति-झलक
मैं ब्लॉग जगत के उन सभी कैदियों की बारी-बारी स्मृति-झलक दिखाये देता हूँ जिनसे मेरी आत्मीयता है.
जब मैंने अपनी पहली रचना डाली तो मुझे पता नहीं था कि
— पोस्ट वाली जगह के नीचे कमेन्ट बॉक्स का क्या रोल है.
— इसे लोग पढेंगे भी या नहीं.
ऑफिस के साथी इन्दर कुमार जी ने मेरा ब्लॉग बनाने में सहयोग किया.
ऑफिस में लंच के समय चोरी से ब्लॉग बनाया गया. "काव्य थेरपी"
जब भी समय मिलता तो कुछ-न-कुछ ब्लॉग पर डालने लगा.
लेकिन एक दिन क्या हुआ कि प्रशंसा से सनी एक टिप्पणी आ गयी और मैं बुरी तरह घबरा गया.
मैंने पूरी पोस्ट ही डिलिट कर दी. कई दिन परेशान रहा.
तब ब्लॉगजगत और चिट्ठाजगत को चोरी-छिपे जानने और समझने में लगाए.
खैर धीरे-धीरे कई बातें जान गया और आज भी मुझे इसकी कई सुविधाओं की जानकारी अमित शर्मा, दीपचंद पाण्डेय और अब कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ श्री सतीश सक्सेना जी देते रहते हैं.
प्रारम्भ में राज भाटिया और समीर लाल जी ने मुझे प्रोत्साहित किया और मैंने उन्हें जाना लेकिन उनके ब्लॉग पर नहीं गया. बाद में जाना जो टिप्पणी करते हैं उनके अपने-अपने ब्लॉग भी होते हैं.
इन सभी स्व-अनुभवों से पहले मेरे नाम वाले ब्लॉग को कोन्स्टेबल सुमित प्रताप सिंह ने बनाकर मुझे बताया था और उसके फायदे बताये थे लेकिन "जब तक स्वयं धारा में नहीं कूदते तैरना नहीं आता". सो धीरे-धीरे मित्रों की मदद से मैं ब्लॉगजगत में बढ़ता गया.
अब मुझे महसूस ही नहीं होता कि मेरा दायरा एक अंकीय ही है. मेरा परिचय दो अंक तक बढ़ गया है और शायद भविष्य में तीन-चार अंक भी छू ले.
मैं नाम लेकर अपने कुछ परिचितों को मंगल कामनाएँ देना चाहता हूँ.
— महामूर्खराज नाम से लिखने वाले, सभी के लिये प्रेम रखने वाले मुकुल अग्रवाल जी
— खयालों के कूप में रहने वाले हरदीप सिंह राणा 'कुँवर' जी
— ब्लॉग लेखन में निरंतरता की मेरी प्रथम प्रेरणा दिलीप सिंह जी
— बिंदास भावेन सम्पूर्ण समीक्षात्मक वार्ता करने वाले रोहित जी
— खासतोर पर नवजात ब्लोगरों को सामान्यतः सभी को ऊर्जा देने वाले समीर लाल जी
— अपनी कविताई से माँ सरस्वती और माँ भारती की सेवा में लगे संजय भास्कर जी,
— अपने बडप्पन की छाया देने वाले श्री अरविन्द जी
— व्याकरणिक त्रुटियों पर ध्यान दिलाने वाली हरकीरत जी
— अपनी रचनाओं से मंत्रमुग्ध करने वाले अविनाश चन्द्र जी
— संस्कृत पठन-पाठन का संकल्प लिये ब्लॉग जगत में बढ़ने वाले श्री आनंद पाण्डेय जी
— स्वयं को कुटिल खल कामी कहकर दूसरों के लिये कहने को कुछ न छोड़ने वाले संजय जी
— कभी ना खाली होने वाले अपने तरकश से कविता के पैने तीर चलाने वाले स्वर्णकार राजेन्द्र जी
— प्रायः सही आकलन कर अंक देने वाले अनचाही बहसबाजी में नाराज हुए उस्ताद जी
— 'मुझे भी खिलाओं नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे' वाली तर्ज पर आये अंग्रेजी के अध्यापक डॉ. जितेन्द्र जौहर जी.... [मजाक किया है बुरा ना मानियेगा जितेन्द्र जी]
— बहुत अनुनय-विनय वाली कविताओं के बाद दर्शन देने वाले और अपनी बुद्धिमत्ता से प्रभावित करने वाले मेरे नवल प्रेरणा स्रोत +
— स्वसा दिव्या जी
— धर्मध्वजा लेकर बढ़ने वाले और मुझे भी अपनी टोली में शामिल कर लेने वाले श्री अमित शर्मा जी
— अपने विविध और आधुनिकतम विचारों से भिगोने वाले मेरे बचपन के साथी श्री दीपचंद पाण्डेय जी,
— मेरी पाठशाला के फाउंडर मेंबर और मोनिटर हंसराज सुज्ञ जी
— पाठशाला में प्री-नर्सरी के संजय जी और आउटर स्टुडेंट नरेश जी
— विचारों को तर्क से ग्रहण करने के हिमायती शेखर सुमन जी
— घर को मन में बसाए नगर में दिन बिता रहे देव कुमार झा जी
................. और वे सभी जिनसे अभी जुड़ना शेष है इस दीपावली को मैं उनके नाम से अपनी स्मृति में प्रेम के दीप जला रहा हूँ.
वैसे तो कई अन्य भी हैं जो मेरी स्मृति में ऊँचे आसन पर बैठे हैं वे इतने ऊँचे बैठे हैं कि वे प्रायः उनको मुझसे संवाद करना याद नहीं रहता. त्यौहार वाले दिन भी नहीं. उन्हें मेरा चरण स्पर्श. क्योंकि उनके चरण ही दिखायी दे रहे हैं.
मंगलवार, 2 नवंबर 2010
उस खुदा से कोई बेहतर नहीं
[यह रचना एक प्रतिक्रिया मात्र है]
जो अमुक तारीख को
भरी थी फीस
लाया था
नयी चप्पलें और कमीज़.
एक कम दाम वाली
साइकिल और
छठी जमात के
दाखिले का परचा
वह भी कई स्कूलों में से
किसी एक बेहतर का.
"मदरसे तो सब एक से होते हैं
वहाँ नहीं होती ऎसी समस्या ढूँढने की"
ऐसा — बड़े अब्बा ने बोला था.
फिर भी ना जाने किस ताकत ने
मुझे सही-सही कदम उठाने को हमेशा उकसाया
लम्बे चौड़े रास्तों पर
चलने की बजाय
मैंने उस पतली गली में
चलना बेहतर पाया
जो बेशक बदबूदार
मीट की दुकानों से पटी थी
फिर भी मुझे
वहाँ से एक झोला भर
रात के खाने का
बंदोबस्त करने की पड़ी थी.
बारूदी पटाखों का शौक मुझे भी था
और मेरे बेटे को भी है.
बहरहाल, बेटा !
जितनी अच्छी बातों का फैसला है
वह मेरा खुदा ही मुझे बक्शता है.
और जितनी मेरी ऐन्द्रीय इच्छाएँ हैं
खाने-पीने और शौक पूरे करने की
उसमें मेरे खुदा का कोई रोल नहीं.
समझे ना बेटा.
उस खुदा से कोई बेहतर नहीं
और मैं भी नहीं.
जो अमुक तारीख को
भरी थी फीस
लाया था
नयी चप्पलें और कमीज़.
एक कम दाम वाली
साइकिल और
छठी जमात के
दाखिले का परचा
वह भी कई स्कूलों में से
किसी एक बेहतर का.
"मदरसे तो सब एक से होते हैं
वहाँ नहीं होती ऎसी समस्या ढूँढने की"
ऐसा — बड़े अब्बा ने बोला था.
फिर भी ना जाने किस ताकत ने
मुझे सही-सही कदम उठाने को हमेशा उकसाया
लम्बे चौड़े रास्तों पर
चलने की बजाय
मैंने उस पतली गली में
चलना बेहतर पाया
जो बेशक बदबूदार
मीट की दुकानों से पटी थी
फिर भी मुझे
वहाँ से एक झोला भर
रात के खाने का
बंदोबस्त करने की पड़ी थी.
बारूदी पटाखों का शौक मुझे भी था
और मेरे बेटे को भी है.
बहरहाल, बेटा !
जितनी अच्छी बातों का फैसला है
वह मेरा खुदा ही मुझे बक्शता है.
और जितनी मेरी ऐन्द्रीय इच्छाएँ हैं
खाने-पीने और शौक पूरे करने की
उसमें मेरे खुदा का कोई रोल नहीं.
समझे ना बेटा.
उस खुदा से कोई बेहतर नहीं
और मैं भी नहीं.
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
नहीं किये हमने समझौते
[अपनी स्मृति के लिए : यह उस दौरान की कविता है जब अमित जी ने अपनी एक पोस्ट में मरू भूमि का एक ऐसा चित्र हमें दिखाया था जिसमें 'रेत' जल की भाँति बहती दिख रही थी, उसे देख मन रोमांचित हो गया था, यह तब ही की रचना है. इस कविता में दो पंक्तियों के बाद मरू ने ही अमित जी को संबोधित किया है.]
सूख चुके पानी के सोते
मन लगाता फिर भी गोते.
दादा जी के प्यारे पोते !
पालो संस्कार के तोते.
जो हममें हैं प्रेम पिरोते
उसके ही हम प्रेमी होते
पहला संस्कार यही है
नहीं परायों सम्मुख रोते.
चाहे जितने प्यासे होते
रहमों के आते हों न्योते
हम उधार का पानी लेकर
अपने अन्दर नहीं समोते.
धर्म बीज को बोते-बोते
खाली सारे हुए हैं पोथे
फिर भी खरपतवार उगे तो
'नहीं किये हमने समझौते.'
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है
हे देवी! छंद के नियम बनाये क्योंकर?
वेदों की छंदों में ही रचना क्योंकर?
किसलिये प्रतीकों में ही सब कुछ बोला?
किसलिये श्लोक रचकर रहस्य ना खोला?
क्या मुक्त छंद में कहना कुछ वर्जित था?
सीधी-सपाट बातें करना वर्जित था?
या बुद्धि नहीं तुमने ऋषियों को दी थी?
अथवा लिखने की उनको ही जल्दी थी?
'कवि' हुए वाल्मिक देख क्रौंच-मैथुन को.
आहत पक्षी कर गया था भावुक उनको.
पहला-पहला तब श्लोक छंद में फूटा.
रामायण को लिख गया था जिसने लूटा.
माँ सरस्वती की कृपा मिली क्यूँ वाकू?
जो रहा था लगभग आधे जीवन डाकू?
या रामायण के लिए भी डाका डाला?
अथवा तुमने ही उसको कवि कर डाला?
हे सरस्वती, बोलो अब तो कुछ बोलो !
क्या अब भी ऐसा हो सकता है? बोलो !!
अब तो कविता में भी हैं कई विधायें.
अच्छी जो लागे राह उसी से आयें.
अब नहीं छंद का बंध न कोई अड़चन.
कविता वो भी, जो है भावों की खुरचन.
कविता का सरलीकरण नहीं है क्या ये?
प्रतिभा का उलटा क्षरण नहीं है क्या ये?
छाया रहस्य प्रगति प्रयोग और हाला.
वादों ने कविता को वैश्या कर डाला.
मिल गयी छूट सबको बलात करने की.
कवि को कविता से खुरापात करने की.
यदि होता कविता का शरीर नारी सम.
हर कवि स्वयं को कहता उसका प्रियतम.
छायावादी छाया में उसको लाता.
धीरे-धीरे उसकी काया सहलाता.
उसको अपने आलिंगन में लाने को
शब्दों का मोहक सुन्दर जाल बिछाता.
लेकिन रहस्यवादी करता सब मन का.
कविता से करता प्रश्न उसी के तन का.
अनजान बना उसके करीब कुछ जाता.
तब पीन उरोजों का रहस्य खुलवाता.
पर, प्रगती...वादी, भोग लगा ठुकराता.
कविता के बदले न..यी कवी..ता लाता.
साहित्य जगत में निष्कलंक होने को
बेचारी कविता को वन्ध्या ठहराता.
और ... प्रयोगवादी करता छेड़खानी.
कविता की कमर पकड़कर कहता "ज़ानी!
करना इंग्लिश अब डांस आपको होगा.
वरना मेरे कोठे पर आना होगा."
अब तो कविता परिभाषा बड़ी विकट है.
खुल्लम-खुल्ला कविता के साथ कपट है.
कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है.
कविता वादों का नहीं कोई सम्पुट है.
ना ही कविता मद्यप का कोई नशा है.
कविता तो रसना-हृत की मध्य दशा है.
जिसकी निह्सृति कवि को वैसे ही होती.
जैसे गर्भस्थ शिशु प्रसव पर होती.
जिसकी पीड़ा जच्चा को लगे सुखद है.
कविता भी ऐसी दशा बिना सरहद है.
रविवार, 26 सितंबर 2010
नित्य प्रार्थना
विद्या विलास में हो तत्पर
मन, शील हमारा हो सुन्दर
तम, भाष हमारा सत्य सहित
मन, मान मलिनता से हटकर.
यम नियम आदि का हो पालन
वैदिक कर्मों से भला इतर.
जग जन-जन के दुःख दूर करे
ऐसी विद्या देना हितकर.
[एक परित्यक्त अर्चना, जो चिकित्सा के लिए 'काव्य थेरपी' औषधालय आ गयी.]
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
जो तय नहीं था
pratulvasistha71@gmail.com
उनको
अपने अनुरूप
कर पाना सरल था.
उससे भी पहले
उनको पा लेना सरल था.
पाकर
प्यार करना सरल था.
प्यार के विभिन्न पड़ावों से होते हुए
भोग तक पहुँच पाना सरल था.
फिर भी
रोकता था मुझको मेरा 'ज़मीर'
अथवा 'समाज का भय' था
किन्तु, इतना तय था ....
वे तोड़ कर सारे बंधन
मिलेंगे मुझको ज़रूर
कहाँ? कब? कैसे?
............. सब कुछ तय था.
लेकिन
राज-घराने की आबरू को बचाने में
राजा, मंत्री, राजपुरोहित
की तन्मयता......... तोडती थी
हमारे आपसी जुड़ाव को.
उनकी याद
दो महीने बाद
बनाकर फरियादी
खींच लायी मुझे राज-दरबार में.
वहाँ की नाटकीयता
करती है मुझको उनसे रू-ब-रू.
जब भी करता हूँ याद —
फरियादी की फ़रियाद :
________"बस एक बार मिलने के बाद चला जाऊँगा"
_____________________ "दूर ........... बहूत दूर."
राजा की चिंता :
________"बेटी का राग
___________घराने के उजले दामन पे दाग
__________________कहाँ मुँह दिखाऊँगा."
मंत्री की दलील :
________ "इस गंदी मछली ने
___________करी है मैली घराने की झील.
_________________ फाँसी दिलाऊँगा."
और
राजपुरोहित ने
मुझको सुनाकर
बोला _________ "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली."
किन्तु अकेले में
राजपुरोहित का राजा से कहना
"वैसे भी राजन! एक तरफ़ा नहीं है
प्रेम इन्हों का.
ये बेटी हमारी, वो बेटा किसी का.
दोनों ही व्याकुल हैं.
मिलने को आतुर हैं.
जुटा लिए हैं मैंने सारे प्रमाण."
पर मेरी गरदन
झुकी है न आगे किसी के.
प्रेम अतिशय था
इसीलिए तय था/ मुझ फरियादी का
राजा के सम्मुख, नतमस्तक होना.
लेकिन
लगायी जो शर्त उन्होंने
"जमाता रहेगा तो तू यहीं का"
कैसे मैं मानूँ?
_______________ जो तय नहीं था.
उनको
अपने अनुरूप
कर पाना सरल था.
उससे भी पहले
उनको पा लेना सरल था.
पाकर
प्यार करना सरल था.
प्यार के विभिन्न पड़ावों से होते हुए
भोग तक पहुँच पाना सरल था.
फिर भी
रोकता था मुझको मेरा 'ज़मीर'
अथवा 'समाज का भय' था
किन्तु, इतना तय था ....
वे तोड़ कर सारे बंधन
मिलेंगे मुझको ज़रूर
कहाँ? कब? कैसे?
............. सब कुछ तय था.
लेकिन
राज-घराने की आबरू को बचाने में
राजा, मंत्री, राजपुरोहित
की तन्मयता......... तोडती थी
हमारे आपसी जुड़ाव को.
उनकी याद
दो महीने बाद
बनाकर फरियादी
खींच लायी मुझे राज-दरबार में.
वहाँ की नाटकीयता
करती है मुझको उनसे रू-ब-रू.
जब भी करता हूँ याद —
फरियादी की फ़रियाद :
________"बस एक बार मिलने के बाद चला जाऊँगा"
_____________________ "दूर ........... बहूत दूर."
राजा की चिंता :
________"बेटी का राग
___________घराने के उजले दामन पे दाग
__________________कहाँ मुँह दिखाऊँगा."
मंत्री की दलील :
________ "इस गंदी मछली ने
___________करी है मैली घराने की झील.
_________________ फाँसी दिलाऊँगा."
और
राजपुरोहित ने
मुझको सुनाकर
बोला _________ "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली."
किन्तु अकेले में
राजपुरोहित का राजा से कहना
"वैसे भी राजन! एक तरफ़ा नहीं है
प्रेम इन्हों का.
ये बेटी हमारी, वो बेटा किसी का.
दोनों ही व्याकुल हैं.
मिलने को आतुर हैं.
जुटा लिए हैं मैंने सारे प्रमाण."
पर मेरी गरदन
झुकी है न आगे किसी के.
प्रेम अतिशय था
इसीलिए तय था/ मुझ फरियादी का
राजा के सम्मुख, नतमस्तक होना.
लेकिन
लगायी जो शर्त उन्होंने
"जमाता रहेगा तो तू यहीं का"
कैसे मैं मानूँ?
_______________ जो तय नहीं था.
शनिवार, 11 सितंबर 2010
शेरा का बसेरा
बहुत दिनों से इंतज़ार है
खेलों का हो जाए सवेरा.
दिनभर बादल छाये रहते
रातों का तो फिक्स अंधेरा.
दिनरात ट्रकों ने भर-भर पैसा
दिल्ली की सड़कों पर गेरा.
कोमनवेल्थ गेम गाँव में
शेरा का बन गया बसेरा.
खेलों का हो जाए सवेरा.
दिनभर बादल छाये रहते
रातों का तो फिक्स अंधेरा.
दिनरात ट्रकों ने भर-भर पैसा
दिल्ली की सड़कों पर गेरा.
कोमनवेल्थ गेम गाँव में
शेरा का बन गया बसेरा.
शीला के घर का शेरू ही
खेलों का मैनेजर शेरा.
कोमनवेल्थ गेम गुफा में
घपले घोटालों का डेरा.
पैसा पानी तरह बहा तो
पानी भी आ गया भतेरा.
आधे अनपूरे कामों पर
हथिनी कुंड ने पानी फेरा.
शेरा .. तेरा शेरा .. मेरा
शेरा को .. पानी ने घेरा.
ऊपर गरजें काले बादल
पीछे हथिनी का जल-घेरा.
डूब रही है झोपड़-पट्टी
डूब रहा उम्मीद बसेरा.
लेकिन अपनी यही कामना
खेलों का हो जाए सवेरा.
रविवार, 5 सितंबर 2010
सूखी वृद्ध-गंध
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आदमी
आदमी
जब अनुभवों से
पक जाता है,
शरीर से
सूख जाता है.
फिर वह
समाज के लिए
अधिक उपयोगी हो जाता है.
सफेदे की पत्तियों की तरह.
सफेदे की पत्तियों की तरह.
पर आज
युवाओं को क्या हुआ है
वह अपनी हथेलियों पर
नहीं मसलता अनुभव की पत्तियाँ.
अपनी ऊर्जावान मांसपेशियों को देखकर
वृद्धों के जर्जर शरीर से तुलना करने लगता है.
सूँघ नहीं पाता वह
तब, चहुँ ओर व्याप्त
सूखी वृद्ध-गंध*.
*सूखी वृद्ध-गंध — अनुभव [जीवनानुभव]
[यह टिप्पणी रूप में विकसित हुई थी और इसका श्रेय शेखर सुमन जी को है, जिनका लिंक है :
http://i555.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html ]
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
मुग्धावस्था का आत्मदाह
pratulvasistha71@gmail.com
जब आप उपलब्ध होते हैं
तब मैं अनुरागी हो जाता हूँ.
तब मैं आपकी नहीं सुनता
बस अपनी ही कहता हूँ.
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह महत्व बनाने की कोशिश है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर प्रेमातिशयता का वाचिक प्रवाह?
जब आप उपलब्ध होते हैं
तब आपके मुझसे बोले कथन
'शब्दों में'
खालिस शब्द ही रह जाते हैं
उनके भीतर का 'अर्थ' निकालना
मुझे याद नहीं रहता.
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह आपके प्रति घोर उपेक्षित भाव है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर मेरी मुग्धावस्था का आत्मदाह?
जब आप उपलब्ध होते हैं
तब मैं आपको बुला लेना चाहता हूँ
'समीप'
जबकि यह 'उपलब्धता' हमेशा आपकी तरफ से होती है
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह मात्र 'शिष्टाचार-निमंत्रण' है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर मेरी आत्मीयता का ताकना अदृश्य राह?
[प्रिय अमित शर्मा जी के लिए मेरे मनोभाव]
जब आप उपलब्ध होते हैं
तब मैं अनुरागी हो जाता हूँ.
तब मैं आपकी नहीं सुनता
बस अपनी ही कहता हूँ.
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह महत्व बनाने की कोशिश है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर प्रेमातिशयता का वाचिक प्रवाह?
जब आप उपलब्ध होते हैं
तब आपके मुझसे बोले कथन
'शब्दों में'
खालिस शब्द ही रह जाते हैं
उनके भीतर का 'अर्थ' निकालना
मुझे याद नहीं रहता.
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह आपके प्रति घोर उपेक्षित भाव है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर मेरी मुग्धावस्था का आत्मदाह?
जब आप उपलब्ध होते हैं
तब मैं आपको बुला लेना चाहता हूँ
'समीप'
जबकि यह 'उपलब्धता' हमेशा आपकी तरफ से होती है
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह मात्र 'शिष्टाचार-निमंत्रण' है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर मेरी आत्मीयता का ताकना अदृश्य राह?
[प्रिय अमित शर्मा जी के लिए मेरे मनोभाव]
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
मरी डायना मोटर अन्दर
pratulvasistha71@gmail.com
[राजकुमारी डायना जी की स्मृति में....]
[कविता में भागती कार की तरह से तीव्रता है, मोड़ हैं, कोशिश की गयी है शब्दों की बुनावट के माध्यम से उस समय को चित्रित करने की]
मरी डायना
मोटर अन्दर
______भाग रही थी
______जान छुड़ाकर
___________फोटोग्राफर
___________करते पीछा
_________________चित्र खींचने
_________________उसके तन का.
_____________प्रेमी उसका
________अल फयाद
________डोडी, भी उसके
____________साथ-साथ था
____________पवन चाल से
________________दौड़ रही थी
________________कार, संतुलन
_____________________संवाहक का
_____________________बिगड़ गया, पथ
_________________मोड़, अचानक
_________________आया, सम्मुख
_________________अकस्मात् था.
____________फटी ब्रेस्ट की
____________नस भीतर ही
________स्राव रक्त का
________होते-होते
___________होश उड़ा ले
___________गया तभी ही.
________खींच रहा था
________फोटोग्राफर
___________फिर भी उसकी
___________मरी देह का
______________चित्र, दीखने
______________वाला कर्षक
________एक विशेष
________एंगल से जो कि
___________कल को शायद
_____________खूब बिकेगा
________________लाख-लाख
___________डॉलर में — छपने.
[राजकुमारी डायना जी की स्मृति में....]
[कविता में भागती कार की तरह से तीव्रता है, मोड़ हैं, कोशिश की गयी है शब्दों की बुनावट के माध्यम से उस समय को चित्रित करने की]
मरी डायना
मोटर अन्दर
______भाग रही थी
______जान छुड़ाकर
___________फोटोग्राफर
___________करते पीछा
_________________चित्र खींचने
_________________उसके तन का.
_____________प्रेमी उसका
________अल फयाद
________डोडी, भी उसके
____________साथ-साथ था
____________पवन चाल से
________________दौड़ रही थी
________________कार, संतुलन
_____________________संवाहक का
_____________________बिगड़ गया, पथ
_________________मोड़, अचानक
_________________आया, सम्मुख
_________________अकस्मात् था.
____________फटी ब्रेस्ट की
____________नस भीतर ही
________स्राव रक्त का
________होते-होते
___________होश उड़ा ले
___________गया तभी ही.
________खींच रहा था
________फोटोग्राफर
___________फिर भी उसकी
___________मरी देह का
______________चित्र, दीखने
______________वाला कर्षक
________एक विशेष
________एंगल से जो कि
___________कल को शायद
_____________खूब बिकेगा
________________लाख-लाख
___________डॉलर में — छपने.
सोमवार, 30 अगस्त 2010
स्वीट पोइज़न
pratulvasistha71@gmail.com
उच्छृंखलता की प्रतीक थी
महिलाओं के लिए ठीक थी
________'लीक तोड़कर भागो बाहर'
________उसकी केवल यही सीख थी.
म्रदु भाषी कहने भर को थी
स्वीट पोइज़न प्रिंस पीक थी.
________माँ सासू एलिजाबेथ की
________दबी-दबी पर तेज़ चीख थी.
उच्छृंखलता की प्रतीक थी
महिलाओं के लिए ठीक थी.
[देवी डायना को आदर्श मानने वाली महिलाओं को समर्पित]
रविवार, 29 अगस्त 2010
रिआया मानसिकता
pratulvasistha71@gmail.com
"मदर!
तुम्हारी देह बूढ़ी
और डायना की ज़वान थी"
भक्त और प्रेमीजन
समीप के
बुढ़िया के नहीं
उसके और उसके मिशन के
नाम पर मिली सुविधाओं के आसक्त हैं.
झन झन
बरसते धन की
उनको निरंतर रखती पास है.
उनकी यहीं आजीविका है.
यहीं धर्म-प्रचार है.
ऐसे ही
विश्वजन
डायना के नहीं प्रेमी.
पुरुषगण
उसकी नंगी देह के आकर्षण में
उत्तेजक स्ट्रक्चर से मुग्ध हैं.
नारियाँ
जगत भर की
उसकी उच्छृंखलता की शुरुआत की प्रशंसक हैं.
'राजसी वधु' नाते
स्थापित किया 'आदर्श' जो उसने
रिआया मानसिकता स्वीकारती है उसको.
"मदर!
तुम्हारी देह बूढ़ी
और डायना की ज़वान थी"
भक्त और प्रेमीजन
समीप के
बुढ़िया के नहीं
उसके और उसके मिशन के
नाम पर मिली सुविधाओं के आसक्त हैं.
झन झन
बरसते धन की
उनको निरंतर रखती पास है.
उनकी यहीं आजीविका है.
यहीं धर्म-प्रचार है.
ऐसे ही
विश्वजन
डायना के नहीं प्रेमी.
पुरुषगण
उसकी नंगी देह के आकर्षण में
उत्तेजक स्ट्रक्चर से मुग्ध हैं.
नारियाँ
जगत भर की
उसकी उच्छृंखलता की शुरुआत की प्रशंसक हैं.
'राजसी वधु' नाते
स्थापित किया 'आदर्श' जो उसने
रिआया मानसिकता स्वीकारती है उसको.
गुरुवार, 26 अगस्त 2010
'प्रचारिका' — क्रिश्चेनिटी की
pratulvasistha71@gmail.com
जन्म शती पर.... [जन्म २६ अगस्त, १९१०]
सुना है मैंने
आपने अपने
जवान और बूढ़े
हाथों से खूब धन लुटाया
ग़रीबों पर, दुखियों पर, लाचारों पर.
भोले, भक्त, निरक्षरों को
शिक्षा दी 'ज्ञान'* की
सेवा की निर्लिप्तता से
निःस्वार्थ मन की भावना से.
फिर भी निर्धनता दूर नहीं हुई
आपके आसपास की.
दिमागी तौर पर कोई विकसित नहीं हुआ
मानता रहा फिर भी तुम्हें देवी
अवतारी व्यक्तित्व एक.
मिली सेवा जिसको भी
बन गया तुम्हारा ही
मतावलंबी.
मरने पर तुम्हारे
लुटाये धन से लाख गुना
खर्च हो गया तुम्हारी ही लाश पर.
तिरंगे में लपेटे तुम्हें
रोते सुबकते रहे
[या मात्र दिखावा ही सही}
असंख्य जन संसार के.
— यह कैसा ज्ञान था
जो मोह से न कर पाया अलग
तुम्हारे ही भक्तों को.
ज्ञान बंधना नहीं
ज्ञान तो मुक्ति है.
खोलना है 'पलकों' का
टिकाना नहीं फिर भी
दृष्टि को जड़ता दे.
खोलना है 'शब्दों' का
अर्थ तक पहुँचकर
व्यंजना तक जाना है.
खोलना है 'ह्रदय' का
त्याग औ' वियोग आदि
में ही आनंद को पाना है.
परन्तु
मदर तुमने
विस्मय में डाल दिया है हमको
संत कहने में संकोच है मुझको
हमारे लिए तुम थीं
'माँ' — स्त्री होने के नाते.
'प्रचारिका' — क्रिश्चेनिटी की.
* 'ज्ञान' से मतलब यीशु-संबंधी ज्ञान से है.
[जिसके जितने अनुयायी या भक्त होंगे, वह उतना ही बड़ा संत और सिद्ध माना जाएगा. वस्तुतः साधक ही सिद्ध को पुजवाते हैं. यदि साधक ही न हों तो सिद्धताई धरी ही रह जायेगी...]
जन्म शती पर.... [जन्म २६ अगस्त, १९१०]
सुना है मैंने
आपने अपने
जवान और बूढ़े
हाथों से खूब धन लुटाया
ग़रीबों पर, दुखियों पर, लाचारों पर.
भोले, भक्त, निरक्षरों को
शिक्षा दी 'ज्ञान'* की
सेवा की निर्लिप्तता से
निःस्वार्थ मन की भावना से.
फिर भी निर्धनता दूर नहीं हुई
आपके आसपास की.
दिमागी तौर पर कोई विकसित नहीं हुआ
मानता रहा फिर भी तुम्हें देवी
अवतारी व्यक्तित्व एक.
मिली सेवा जिसको भी
बन गया तुम्हारा ही
मतावलंबी.
मरने पर तुम्हारे
लुटाये धन से लाख गुना
खर्च हो गया तुम्हारी ही लाश पर.
तिरंगे में लपेटे तुम्हें
रोते सुबकते रहे
[या मात्र दिखावा ही सही}
असंख्य जन संसार के.
— यह कैसा ज्ञान था
जो मोह से न कर पाया अलग
तुम्हारे ही भक्तों को.
ज्ञान बंधना नहीं
ज्ञान तो मुक्ति है.
खोलना है 'पलकों' का
टिकाना नहीं फिर भी
दृष्टि को जड़ता दे.
खोलना है 'शब्दों' का
अर्थ तक पहुँचकर
व्यंजना तक जाना है.
खोलना है 'ह्रदय' का
त्याग औ' वियोग आदि
में ही आनंद को पाना है.
परन्तु
मदर तुमने
विस्मय में डाल दिया है हमको
संत कहने में संकोच है मुझको
हमारे लिए तुम थीं
'माँ' — स्त्री होने के नाते.
'प्रचारिका' — क्रिश्चेनिटी की.
* 'ज्ञान' से मतलब यीशु-संबंधी ज्ञान से है.
[जिसके जितने अनुयायी या भक्त होंगे, वह उतना ही बड़ा संत और सिद्ध माना जाएगा. वस्तुतः साधक ही सिद्ध को पुजवाते हैं. यदि साधक ही न हों तो सिद्धताई धरी ही रह जायेगी...]
बुधवार, 25 अगस्त 2010
गद्दार
गौरव अपने ..........आखिरकार
बने .....बड़े दिन में ..........H R.
हँसमुख पहले था ...... किरदार
अब ..... वनमानुस का अवतार.
चुप-चुप रहना, छिप-छिप हँसना
हैं सचमुच........ अदभुत सरदार.
सीमा....विप्रा .....पाठ.... पढ़ातीं
"कम बोलो...कम खोलो ....द्वार."
पहले .....पाँव ..... फैला लेते थे
अब .... सिमटा ...उनका संसार.
चैटिंग कोना ...... नहीं चहकता
मोबाइल पर ........ होता प्यार.
विप्रा और सीमा की ..... आँखें
बनी हुई हैं ............... पहरेदार.
दोस्त पुराने ......... बोला करते
प्रेम भरे स्वर में ...... "गद्दार”.
[अपने साथी गौरव वीर सिंह 'गिल' जी पर लिखी गयी कविता, जो अब HR मेनेजर हो गए हैं.]
सोमवार, 23 अगस्त 2010
ऊर्जा की सार्थकता
pratulvasistha71@gmail.com
चौराहे के
एक किनारे पर
बैठी कुतिया
चाटती, सहलाती
स्वान-कर्षित अंगों को
अब लगाए है आस
फिर से किसी का उद्दीप्त करने को विकार.
होना नहीं चाहती वह
मातृत्व बोझ से बोझिल
सो नहीं समझती वह
या समझना नहीं चाहती वह
उस विकार से जन्मे सुख को.
हाय!
कुचल डाला
अधो भाग उसका
किसी दैत्य से वाहन ने
पहले ही खून से लथपथ टायरों से.
न अब
किसी विकार को
पनपने देने की इच्छायें हैं शेष
और न बलवती है वह अनवरत प्यास
उस स्वान के प्रेम में अंधी हुई कुतिया की.
पर वह वाहन
निश्चिन्त-सा क्यों है?
समझना नहीं चाहता वह —
'एक को आहत कर
दोष उसी पर मढ़
और अब दूसरे की बारी पर
निश्चिन्त गुज़र कर'
अपनी 'ऊर्जा की सार्थकता'!
चौराहे के
एक किनारे पर
बैठी कुतिया
चाटती, सहलाती
स्वान-कर्षित अंगों को
अब लगाए है आस
फिर से किसी का उद्दीप्त करने को विकार.
होना नहीं चाहती वह
मातृत्व बोझ से बोझिल
सो नहीं समझती वह
या समझना नहीं चाहती वह
उस विकार से जन्मे सुख को.
हाय!
कुचल डाला
अधो भाग उसका
किसी दैत्य से वाहन ने
पहले ही खून से लथपथ टायरों से.
न अब
किसी विकार को
पनपने देने की इच्छायें हैं शेष
और न बलवती है वह अनवरत प्यास
उस स्वान के प्रेम में अंधी हुई कुतिया की.
पर वह वाहन
निश्चिन्त-सा क्यों है?
समझना नहीं चाहता वह —
'एक को आहत कर
दोष उसी पर मढ़
और अब दूसरे की बारी पर
निश्चिन्त गुज़र कर'
अपनी 'ऊर्जा की सार्थकता'!
शनिवार, 21 अगस्त 2010
पुरानी कविता
mailto:pratulvasistha71@gmail.com
[ये कवितायें कभी मैंने नई कविता के विरोध में लिखी थीं और उसमें अपने बचपन के चित्र डालकर खुश हुआ था. मैंने अपने इस प्रयास को 'पुरानी कविता' नाम दिया था.]
[१]
"उई"
छील सरकंडा
लगा था ब्लेड
ओड़े हाथ में.
'लाल' आया खून
मैंने —
'उई' बोला साथ में.
[२]
टोबा
ले गया 'टोबा'
कलम से
वो मेरी दवात से.
शरारती है
खींचता अब
बस्ता मेरा लात से.
[३]
सुलेख
तख्ती लिखी थी
इसलिए तो
अब हमारा है सुलेख
रोज़ाना गाची मली थी
इसलिए तो
नये लिखकर
जलाता हूँ.
मैं पुराने लेख.
[मेरे बचपन के साथी 'दीपक', 'मुन्नम' और 'चाँद' के साथ बिताये लम्हों को याद करते भाव-चित्र]
ये सभी सौलह वर्ष पुरानी रचनाएँ हैं.
[ये कवितायें कभी मैंने नई कविता के विरोध में लिखी थीं और उसमें अपने बचपन के चित्र डालकर खुश हुआ था. मैंने अपने इस प्रयास को 'पुरानी कविता' नाम दिया था.]
[१]
"उई"
छील सरकंडा
लगा था ब्लेड
ओड़े हाथ में.
'लाल' आया खून
मैंने —
'उई' बोला साथ में.
[२]
टोबा
ले गया 'टोबा'
कलम से
वो मेरी दवात से.
शरारती है
खींचता अब
बस्ता मेरा लात से.
[३]
सुलेख
तख्ती लिखी थी
इसलिए तो
अब हमारा है सुलेख
रोज़ाना गाची मली थी
इसलिए तो
नये लिखकर
जलाता हूँ.
मैं पुराने लेख.
[मेरे बचपन के साथी 'दीपक', 'मुन्नम' और 'चाँद' के साथ बिताये लम्हों को याद करते भाव-चित्र]
ये सभी सौलह वर्ष पुरानी रचनाएँ हैं.
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
आइये और ......"बैठ जाइये"
pratulvasistha71@gmail.com
भारतीय लोकसभा में सबसे अधिक बोला जाने वाला शब्द "बैठ जाइये" है.
कहते हैं सभ्य वह होता है जिसे सभा में बैठने का सलीका आता हो.
'सभ्य' शब्द 'सभा' से निर्मित है. इसका सीधा अर्थ है सभा में बैठने योग्य.
सभा में वही बैठने योग्य है जिसे 'सभा' में बैठने के तौर-तरीके आते हों.
देश की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सभा 'लोकसभा' जहाँ नीति-निर्धारण और बनी-बनायी नीतियों की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर समय-समय पर बातचीत होती है, नीतियों के असफल होने पर उसमें सुधार करने के लिए संशोधन भी किये जाते हैं. हम नयी नीतियों के निर्माण के लिए प्रयास भी होता देखते हैं. प्रयास के रूप में .... वही धमाचौकड़ी, वही जूतम-पैजार, वही मारामारी, वही गाली-गलौज, वही आरोप-प्रत्यारोप जिसे शुरू हुए संसद-सत्रों में आम-जनता देश के कर्णधारों के बीच होते देखती है.
एक विचित्र-सी स्थिति देखता हूँ लोकसभा में. ...
हाँ यह सही है कि अपनी बात अपनी बारी पर कही जाए, इससे सभा में अराजकता नहीं फैलती. मुद्दे पर बात भी हो जाती है.
लेकिन जहाँ बहुमत वाली सरकार जंगली कुत्तों* की तरह विपक्ष पर पिल पड़ी हो तब मन में तमाम तरह के सवालों को लेकर आये विपक्षी सांसद अपने को बेफकूफ बनता देख बौखला जाते हैं. और समय-असमय असभ्यता कर बैठते है.
हाँ, नेताओं में अधिक धीरज होना चाहिए. बिलकुल सही बात है. यह धीरज कभी-कभी इतना लंबा हो जाता है कि सभा-विसर्जित हो जाती है, और यदि यह धीरज और धैर्यवान हुआ तब तो पूरा सत्र ही समाप्त हो जाता है.
"धैर्य" ....... विपक्षी पार्षद "धैर्य".
"धैर्य" ....... विपक्षी विधायक "धैर्य".
"धैर्य" ....... विपक्षी सांसद "धैर्य".
"बैठ जाइये" और अपनी बारी का इंतज़ार करिए.
अपनी बात शान्ति से कहिये. अभी 'ओनेरेबल मिनिस्टर जी' बोल रहे हैं.......... बैठ जाइये.
"बैठ जाइये" ........ "बैठ जाइये" ..........."बैठ जाइये"
शोर मत करिए, 'बैठ जाइये" .......... "बैठ जाइये" .
यह देश की सबसे बड़ी सभा है ........ "बैठ जाइये".
* एक शेर का शिकार तो छह जंगली कुत्ते भी मिलकर कर लेते हैं. इस बात के मद्येनज़र ही विपक्षी सांसद को दबाने की बात की है. इन जंगली कुत्तों में ..... 'मंत्री', 'स्पीकर' का पक्षपातपूर्ण-व्यवहार, 'मार्शल' का सतत खौफ, सत्ता-पक्ष का भूतिया माहौल (हौवा), अपनी पद-निरस्तता का डर शामिल हैं.]
हमें इस सभा से ही अपेक्षा रहती है कि सभ्यता बरकरार रहे और वहीं............यह ......... असभ्य..ता.
[लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार को समर्पित]
भारतीय लोकसभा में सबसे अधिक बोला जाने वाला शब्द "बैठ जाइये" है.
कहते हैं सभ्य वह होता है जिसे सभा में बैठने का सलीका आता हो.
'सभ्य' शब्द 'सभा' से निर्मित है. इसका सीधा अर्थ है सभा में बैठने योग्य.
सभा में वही बैठने योग्य है जिसे 'सभा' में बैठने के तौर-तरीके आते हों.
देश की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सभा 'लोकसभा' जहाँ नीति-निर्धारण और बनी-बनायी नीतियों की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर समय-समय पर बातचीत होती है, नीतियों के असफल होने पर उसमें सुधार करने के लिए संशोधन भी किये जाते हैं. हम नयी नीतियों के निर्माण के लिए प्रयास भी होता देखते हैं. प्रयास के रूप में .... वही धमाचौकड़ी, वही जूतम-पैजार, वही मारामारी, वही गाली-गलौज, वही आरोप-प्रत्यारोप जिसे शुरू हुए संसद-सत्रों में आम-जनता देश के कर्णधारों के बीच होते देखती है.
एक विचित्र-सी स्थिति देखता हूँ लोकसभा में. ...
हाँ यह सही है कि अपनी बात अपनी बारी पर कही जाए, इससे सभा में अराजकता नहीं फैलती. मुद्दे पर बात भी हो जाती है.
लेकिन जहाँ बहुमत वाली सरकार जंगली कुत्तों* की तरह विपक्ष पर पिल पड़ी हो तब मन में तमाम तरह के सवालों को लेकर आये विपक्षी सांसद अपने को बेफकूफ बनता देख बौखला जाते हैं. और समय-असमय असभ्यता कर बैठते है.
हाँ, नेताओं में अधिक धीरज होना चाहिए. बिलकुल सही बात है. यह धीरज कभी-कभी इतना लंबा हो जाता है कि सभा-विसर्जित हो जाती है, और यदि यह धीरज और धैर्यवान हुआ तब तो पूरा सत्र ही समाप्त हो जाता है.
"धैर्य" ....... विपक्षी पार्षद "धैर्य".
"धैर्य" ....... विपक्षी विधायक "धैर्य".
"धैर्य" ....... विपक्षी सांसद "धैर्य".
"बैठ जाइये" और अपनी बारी का इंतज़ार करिए.
अपनी बात शान्ति से कहिये. अभी 'ओनेरेबल मिनिस्टर जी' बोल रहे हैं.......... बैठ जाइये.
"बैठ जाइये" ........ "बैठ जाइये" ..........."बैठ जाइये"
शोर मत करिए, 'बैठ जाइये" .......... "बैठ जाइये" .
यह देश की सबसे बड़ी सभा है ........ "बैठ जाइये".
* एक शेर का शिकार तो छह जंगली कुत्ते भी मिलकर कर लेते हैं. इस बात के मद्येनज़र ही विपक्षी सांसद को दबाने की बात की है. इन जंगली कुत्तों में ..... 'मंत्री', 'स्पीकर' का पक्षपातपूर्ण-व्यवहार, 'मार्शल' का सतत खौफ, सत्ता-पक्ष का भूतिया माहौल (हौवा), अपनी पद-निरस्तता का डर शामिल हैं.]
हमें इस सभा से ही अपेक्षा रहती है कि सभ्यता बरकरार रहे और वहीं............यह ......... असभ्य..ता.
[लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार को समर्पित]
गुरुवार, 19 अगस्त 2010
कीचड़
[बारिश में चारों तरफ पानी और कीचड़ ने मुझे अपने अंतरतम में बने कीचड़ की याद करायी. और फिर मैं अपनी नज़रों में शर्म से पानी-पानी हुआ.]
किन शब्दों में स्वीकार करूँ
अपराध भावना मैं मन की
.................."मैं पापी हूँ"
— बस इतने से न बात अलम.
'रो पड़ी'
विवश होकर गुडिया.
आँसू आये
आँसू में घृणा
घृणा मुझसे
.......ना, नहीं
शायद, मेरे दुर्भावों से.
आँसू में
'अपनापन अभाव' की पीड़ा
किसको अपना वह कहे यहाँ
हर वस्तु उसे
..............'मौसी घर' का
..............'शो-पीस' लगे.
हमने अपनेपन का
अन-अर्थ बना डाला खुद ही.
वह नहीं बोलती
............ अथवा
है नहीं ज़रुरत
— सचमुच
उसको किसी वस्तु की.
कैसे मानूँ —
वह खुश है,
— स्वतंत्रमना है.
रवि अस्त
घूमता हस्त
पाप का तम में
छूने को गुड़िया के कपोल
— वात्सल्य किवा अपराध सोच?
रवि उदय अभी होने में बाक़ी
एक प्रहर
कालिमा और घहराती
जाती है सत्वर.
'पापों के मेरे नहीं थाह'
चाहे लिक्खूँ दीवारों पर
— शान्तं पापं —
हर जगह स्वयं के सम्मुख
वह नहीं शांत होते हैं पर
(सीमित कविता तक
वह तो केवल).
स्पर्श कर रहा था मैं
सारे तोड़ बंध
संयम, मर्यादा, लोक-लाज,
बकवास जान पड़ते थे.
— गुड़िया करे शयन —
पड़ गयी पता
'आवश्यकता'
क्या है गुड़िया की.
जो रही छिपा
— लज्जा कारण —
'मुझे छोड़ वहीं आओ (वापस)'
— पीड़ित करते हैं शब्द —
वह तप्त अश्रु
नन्हें हाथों से पोंछ रही.
पर,
पोंछ नहीं पाती
विश्वासों के
नयनों की
'कीचड'
[शायद मैं अपने मन की चिकित्सा करने निमित्त यह भाव सार्वजनिक कर रहा हूँ.]
किन शब्दों में स्वीकार करूँ
अपराध भावना मैं मन की
.................."मैं पापी हूँ"
— बस इतने से न बात अलम.
'रो पड़ी'
विवश होकर गुडिया.
आँसू आये
आँसू में घृणा
घृणा मुझसे
.......ना, नहीं
शायद, मेरे दुर्भावों से.
आँसू में
'अपनापन अभाव' की पीड़ा
किसको अपना वह कहे यहाँ
हर वस्तु उसे
..............'मौसी घर' का
..............'शो-पीस' लगे.
हमने अपनेपन का
अन-अर्थ बना डाला खुद ही.
वह नहीं बोलती
............ अथवा
है नहीं ज़रुरत
— सचमुच
उसको किसी वस्तु की.
कैसे मानूँ —
वह खुश है,
— स्वतंत्रमना है.
रवि अस्त
घूमता हस्त
पाप का तम में
छूने को गुड़िया के कपोल
— वात्सल्य किवा अपराध सोच?
रवि उदय अभी होने में बाक़ी
एक प्रहर
कालिमा और घहराती
जाती है सत्वर.
'पापों के मेरे नहीं थाह'
चाहे लिक्खूँ दीवारों पर
— शान्तं पापं —
हर जगह स्वयं के सम्मुख
वह नहीं शांत होते हैं पर
(सीमित कविता तक
वह तो केवल).
स्पर्श कर रहा था मैं
सारे तोड़ बंध
संयम, मर्यादा, लोक-लाज,
बकवास जान पड़ते थे.
— गुड़िया करे शयन —
पड़ गयी पता
'आवश्यकता'
क्या है गुड़िया की.
जो रही छिपा
— लज्जा कारण —
'मुझे छोड़ वहीं आओ (वापस)'
— पीड़ित करते हैं शब्द —
वह तप्त अश्रु
नन्हें हाथों से पोंछ रही.
पर,
पोंछ नहीं पाती
विश्वासों के
नयनों की
'कीचड'
[शायद मैं अपने मन की चिकित्सा करने निमित्त यह भाव सार्वजनिक कर रहा हूँ.]
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