शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है

हे देवी! छंद के नियम बनाये क्योंकर? 
वेदों की छंदों में ही रचना क्योंकर? 
किसलिये प्रतीकों में ही सब कुछ बोला? 
किसलिये श्लोक रचकर रहस्य ना खोला? 

क्या मुक्त छंद में कहना कुछ वर्जित था? 
सीधी-सपाट बातें करना वर्जित था? 
या बुद्धि नहीं तुमने ऋषियों को दी थी? 
अथवा लिखने की उनको ही जल्दी थी? 

'कवि' हुए वाल्मिक देख क्रौंच-मैथुन को. 
आहत पक्षी कर गया था भावुक उनको. 
पहला-पहला तब श्लोक छंद में फूटा. 
रामायण को लिख गया था जिसने लूटा. 

माँ सरस्वती की कृपा मिली क्यूँ वाकू? 
जो रहा था लगभग आधे जीवन डाकू? 
या रामायण के लिए भी डाका डाला? 
अथवा तुमने ही उसको कवि कर डाला? 

हे सरस्वती, बोलो अब तो कुछ बोलो !
क्या अब भी ऐसा हो सकता है? बोलो !!

अब तो कविता में भी हैं कई विधायें. 
अच्छी जो लागे राह उसी से आयें. 
अब नहीं छंद का बंध न कोई अड़चन. 
कविता वो भी, जो है भावों की खुरचन. 

कविता का सरलीकरण नहीं है क्या ये? 
प्रतिभा का उलटा क्षरण नहीं है क्या ये? 

छाया रहस्य प्रगति प्रयोग और हाला. 
वादों ने कविता को वैश्या कर डाला. 
मिल गयी छूट सबको बलात करने की. 
कवि को कविता से खुरापात करने की. 

यदि होता कविता का शरीर नारी सम. 
हर कवि स्वयं को कहता उसका प्रियतम. 

छायावादी छाया में उसको लाता. 
धीरे-धीरे उसकी काया सहलाता. 
उसको अपने आलिंगन में लाने को 
शब्दों का मोहक सुन्दर जाल बिछाता. 

लेकिन रहस्यवादी करता सब मन का. 
कविता से करता प्रश्न उसी के तन का. 
अनजान बना उसके करीब कुछ जाता. 
तब पीन उरोजों का रहस्य खुलवाता. 

पर, प्रगती...वादी, भोग लगा ठुकराता. 
कविता के बदले न..यी कवी..ता लाता. 
साहित्य जगत में निष्कलंक होने को 
बेचारी कविता को वन्ध्या ठहराता. 

और ... प्रयोगवादी करता छेड़खानी. 
कविता की कमर पकड़कर कहता "ज़ानी! 
करना इंग्लिश अब डांस आपको होगा. 
वरना मेरे कोठे पर आना होगा."

अब तो कविता परिभाषा बड़ी विकट है. 
खुल्लम-खुल्ला कविता के साथ कपट है. 
कविता कवि की कल्पना नहीं न लत है. 
कविता वादों का नहीं कोई सम्पुट है. 

ना ही कविता मद्यप का कोई नशा है. 
कविता तो रसना-हृत की मध्य दशा है. 
जिसकी निह्सृति कवि को वैसे ही होती. 
जैसे गर्भस्थ शिशु प्रसव पर होती. 

जिसकी पीड़ा जच्चा को लगे सुखद है. 
कविता भी ऐसी दशा बिना सरहद है. 





रविवार, 26 सितंबर 2010

नित्य प्रार्थना


विद्या विलास में हो तत्पर 
मन, शील हमारा हो सुन्दर 
तम, भाष हमारा सत्य सहित 
मन, मान मलिनता से हटकर. 

यम नियम आदि का हो पालन 
वैदिक कर्मों से भला इतर. 
जग जन-जन के दुःख दूर करे 
ऐसी विद्या देना हितकर. 

[एक परित्यक्त अर्चना, जो चिकित्सा के लिए 'काव्य थेरपी' औषधालय आ गयी.]

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

जो तय नहीं था

pratulvasistha71@gmail.com

उनको
अपने अनुरूप
कर पाना सरल था.
उससे भी पहले
उनको पा लेना सरल था.
पाकर
प्यार करना सरल था.
प्यार के विभिन्न पड़ावों से होते हुए
भोग तक पहुँच पाना सरल था.
फिर भी
रोकता था मुझको मेरा 'ज़मीर'
अथवा 'समाज का भय' था
किन्तु, इतना तय था ....
वे तोड़ कर सारे बंधन
मिलेंगे मुझको ज़रूर
कहाँ? कब? कैसे?
............. सब कुछ तय था.

लेकिन
राज-घराने की आबरू को बचाने में
राजा, मंत्री, राजपुरोहित
की तन्मयता......... तोडती थी
हमारे आपसी जुड़ाव को.

उनकी याद
दो महीने बाद
बनाकर फरियादी
खींच लायी मुझे राज-दरबार में.

वहाँ की नाटकीयता
करती है मुझको उनसे रू-ब-रू.
जब भी करता हूँ याद —

फरियादी की फ़रियाद :
________"बस एक बार मिलने के बाद चला जाऊँगा"
_____________________ "दूर ........... बहूत दूर."

राजा की चिंता :
________"बेटी का राग
___________घराने के उजले दामन पे दाग
__________________कहाँ मुँह दिखाऊँगा."

मंत्री की दलील :
________ "इस गंदी मछली ने
___________करी है मैली घराने की झील.
_________________ फाँसी दिलाऊँगा."

और
राजपुरोहित ने
मुझको सुनाकर
बोला _________ "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली."

किन्तु अकेले में
राजपुरोहित का राजा से कहना
"वैसे भी राजन! एक तरफ़ा नहीं है
प्रेम इन्हों का.
ये बेटी हमारी, वो बेटा किसी का.
दोनों ही व्याकुल हैं.
मिलने को आतुर हैं.
जुटा लिए हैं मैंने सारे प्रमाण."

पर मेरी गरदन
झुकी है न आगे किसी के.
प्रेम अतिशय था
इसीलिए तय था/ मुझ फरियादी का
राजा के सम्मुख, नतमस्तक होना.
लेकिन
लगायी जो शर्त उन्होंने
"जमाता रहेगा तो तू यहीं का"

कैसे मैं मानूँ?
_______________ जो तय नहीं था.


शनिवार, 11 सितंबर 2010

शेरा का बसेरा

बहुत दिनों से इंतज़ार है 
खेलों का हो जाए सवेरा.
दिनभर बादल छाये रहते 
रातों का तो फिक्स अंधेरा. 


दिनरात ट्रकों ने भर-भर पैसा 
दिल्ली की सड़कों पर गेरा.
कोमनवेल्थ गेम गाँव में 
शेरा का बन गया बसेरा. 

शीला के घर का शेरू ही  
खेलों का मैनेजर शेरा. 
कोमनवेल्थ गेम गुफा में 
घपले घोटालों का डेरा. 

पैसा पानी तरह बहा तो 
पानी भी आ गया भतेरा.
आधे अनपूरे कामों पर 
हथिनी कुंड ने पानी फेरा. 

शेरा .. तेरा शेरा .. मेरा   
शेरा को .. पानी ने घेरा. 
ऊपर गरजें काले बादल 
पीछे हथिनी का जल-घेरा. 

डूब रही है झोपड़-पट्टी 
डूब रहा उम्मीद बसेरा. 
लेकिन अपनी यही कामना 
खेलों का हो जाए सवेरा. 

रविवार, 5 सितंबर 2010

सूखी वृद्ध-गंध

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आदमी 
जब अनुभवों से 
पक जाता है, 
शरीर से 
सूख जाता है. 
फिर वह 
समाज के लिए 
अधिक उपयोगी हो जाता है.
सफेदे की पत्तियों की तरह. 

पर आज 
युवाओं को क्या हुआ है 
वह अपनी हथेलियों पर 
नहीं मसलता अनुभव की पत्तियाँ. 

अपनी ऊर्जावान मांसपेशियों को देखकर 
वृद्धों के जर्जर शरीर से तुलना करने लगता है. 
सूँघ नहीं पाता वह 
तब, चहुँ ओर व्याप्त 
सूखी वृद्ध-गंध*. 


*सूखी वृद्ध-गंध — अनुभव [जीवनानुभव]
[यह टिप्पणी रूप में विकसित हुई थी और इसका श्रेय शेखर सुमन जी को है, जिनका लिंक है : 
http://i555.blogspot.com/2010/08/blog-post_29.html ]

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

मुग्धावस्था का आत्मदाह

pratulvasistha71@gmail.com

जब आप उपलब्ध होते हैं
तब मैं अनुरागी हो जाता हूँ.
तब मैं आपकी नहीं सुनता
बस अपनी ही कहता हूँ.
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह महत्व बनाने की कोशिश है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर प्रेमातिशयता का वाचिक प्रवाह?

जब आप उपलब्ध होते हैं
तब आपके मुझसे बोले कथन
'शब्दों में'
खालिस शब्द ही रह जाते हैं
उनके भीतर का 'अर्थ' निकालना
मुझे याद नहीं रहता.
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह आपके प्रति घोर उपेक्षित भाव है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर मेरी मुग्धावस्था का आत्मदाह?

जब आप उपलब्ध होते हैं
तब मैं आपको बुला लेना चाहता हूँ
'समीप'
जबकि यह 'उपलब्धता' हमेशा आपकी तरफ से होती है
>>>>>>>>>>>>>> क्या यह मात्र 'शिष्टाचार-निमंत्रण' है
>>>>>>>>>>>>>> या फिर मेरी आत्मीयता का ताकना अदृश्य राह?

[प्रिय अमित शर्मा जी के लिए मेरे मनोभाव]

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

मरी डायना मोटर अन्दर

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[राजकुमारी डायना जी की स्मृति में....]
[कविता में भागती कार की तरह से तीव्रता है, मोड़ हैं, कोशिश की गयी है शब्दों की बुनावट के माध्यम से उस समय को चित्रित करने की]

मरी डायना
मोटर अन्दर
______भाग रही थी
______जान छुड़ाकर
___________फोटोग्राफर 

___________करते पीछा 

_________________चित्र खींचने 

_________________उसके तन का. 

_____________प्रेमी उसका 

________अल फयाद
________डोडी, भी उसके
____________साथ-साथ था 

____________पवन चाल से 

________________दौड़ रही थी 

________________कार, संतुलन 

_____________________संवाहक का 

_____________________बिगड़ गया, पथ 

_________________मोड़, अचानक 

_________________आया, सम्मुख 

_________________अकस्मात् था. 

____________फटी ब्रेस्ट की 

____________नस भीतर ही 

________स्राव रक्त का
________होते-होते
___________होश उड़ा ले 

___________गया तभी ही. 

________खींच रहा था 

________फोटोग्राफर
___________फिर भी उसकी 

___________मरी देह का 

______________चित्र, दीखने 

______________वाला कर्षक 

________एक विशेष 

________एंगल से जो कि 

___________कल को शायद 

_____________खूब बिकेगा 

________________लाख-लाख 

___________डॉलर में — छपने. 

सोमवार, 30 अगस्त 2010

स्वीट पोइज़न

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उच्छृंखलता की प्रतीक थी 
महिलाओं के लिए ठीक थी 
________'लीक तोड़कर भागो बाहर' 
________उसकी केवल यही सीख थी. 
म्रदु भाषी कहने भर को थी 
स्वीट पोइज़न प्रिंस पीक थी. 
________माँ सासू एलिजाबेथ की 
________दबी-दबी पर तेज़ चीख थी.
उच्छृंखलता की प्रतीक थी 
महिलाओं के लिए ठीक थी.


[देवी डायना को आदर्श मानने वाली महिलाओं को समर्पित]

रविवार, 29 अगस्त 2010

रिआया मानसिकता

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"मदर!
तुम्हारी देह बूढ़ी
और डायना की ज़वान थी"

भक्त और प्रेमीजन
समीप के
बुढ़िया के नहीं
उसके और उसके मिशन के
नाम पर मिली सुविधाओं के आसक्त हैं.

झन झन
बरसते धन की
उनको निरंतर रखती पास है.
उनकी यहीं आजीविका है.
यहीं धर्म-प्रचार है.

ऐसे ही
विश्वजन
डायना के नहीं प्रेमी.
पुरुषगण
उसकी नंगी देह के आकर्षण में
उत्तेजक स्ट्रक्चर से मुग्ध हैं.

नारियाँ
जगत भर की
उसकी उच्छृंखलता की शुरुआत की प्रशंसक हैं.

'राजसी वधु' नाते
स्थापित किया 'आदर्श' जो उसने
रिआया मानसिकता स्वीकारती है उसको.

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

'प्रचारिका' — क्रिश्चेनिटी की

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जन्म शती पर.... [जन्म २६ अगस्त, १९१०]
सुना है मैंने 
आपने अपने 
जवान और बूढ़े 
हाथों से खूब धन लुटाया 
ग़रीबों पर, दुखियों पर, लाचारों पर. 
भोले, भक्त, निरक्षरों को
शिक्षा दी 'ज्ञान'* की 
सेवा की निर्लिप्तता से 
निःस्वार्थ मन की भावना से. 


फिर भी निर्धनता दूर नहीं हुई 
आपके आसपास की. 
दिमागी तौर पर कोई विकसित नहीं हुआ 
मानता रहा फिर भी तुम्हें देवी 
अवतारी व्यक्तित्व एक. 
मिली सेवा जिसको भी 
बन गया तुम्हारा ही 
मतावलंबी. 


मरने पर तुम्हारे 
लुटाये धन से लाख गुना 
खर्च हो गया तुम्हारी ही लाश पर. 


तिरंगे में लपेटे तुम्हें 
रोते सुबकते रहे 
[या मात्र दिखावा ही सही} 
असंख्य जन संसार के. 


— यह कैसा ज्ञान था
जो मोह से न कर पाया अलग 
तुम्हारे ही भक्तों को. 


ज्ञान बंधना नहीं 
ज्ञान तो मुक्ति है. 
खोलना है 'पलकों' का 
टिकाना नहीं फिर भी 
दृष्टि को जड़ता दे. 
खोलना है 'शब्दों' का 
अर्थ तक पहुँचकर  
व्यंजना तक जाना है. 
खोलना है 'ह्रदय' का 
त्याग औ' वियोग आदि 
में ही आनंद को पाना है. 


परन्तु 
मदर तुमने 
विस्मय में डाल दिया है हमको 
संत कहने में संकोच है मुझको 
हमारे लिए तुम थीं 
'माँ' — स्त्री होने के नाते. 
'प्रचारिका' — क्रिश्चेनिटी की. 


* 'ज्ञान'  से मतलब यीशु-संबंधी ज्ञान से है. 
[जिसके जितने अनुयायी या भक्त होंगे, वह उतना ही बड़ा संत और सिद्ध माना जाएगा. वस्तुतः साधक ही सिद्ध को पुजवाते हैं. यदि साधक ही न हों तो सिद्धताई धरी ही रह जायेगी...]

बुधवार, 25 अगस्त 2010

गद्दार



गौरव अपने ..........आखिरकार
बने .....बड़े दिन में ..........H R.
हँसमुख पहले था ...... किरदार
अब ..... वनमानुस का अवतार.


चुप-चुप रहना, छिप-छिप हँसना
हैं सचमुच........ अदभुत सरदार.
सीमा....विप्रा .....पाठ.... पढ़ातीं
"कम बोलो...कम खोलो ....द्वार."


पहले .....पाँव ..... फैला लेते थे
अब .... सिमटा ...उनका संसार.
चैटिंग कोना ...... नहीं चहकता
मोबाइल पर ........ होता प्यार.


विप्रा और सीमा की ..... आँखें
बनी हुई हैं ............... पहरेदार.
दोस्त पुराने ......... बोला करते
प्रेम भरे स्वर में ...... "गद्दार”.





[अपने साथी गौरव वीर सिंह 'गिल' जी पर लिखी गयी कविता, जो अब HR मेनेजर हो गए हैं.] 

सोमवार, 23 अगस्त 2010

ऊर्जा की सार्थकता

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चौराहे के
एक किनारे पर
बैठी कुतिया
चाटती, सहलाती
स्वान-कर्षित अंगों को
अब लगाए है आस
फिर से किसी का उद्दीप्त करने को विकार.

होना नहीं चाहती वह
मातृत्व बोझ से बोझिल
सो नहीं समझती वह
या समझना नहीं चाहती वह
उस विकार से जन्मे सुख को.

हाय!
कुचल डाला
अधो भाग उसका
किसी दैत्य से वाहन ने
पहले ही खून से लथपथ टायरों से.

न अब
किसी विकार को
पनपने देने की इच्छायें हैं शेष
और न बलवती है वह अनवरत प्यास
उस स्वान के प्रेम में अंधी हुई कुतिया की.

पर वह वाहन
निश्चिन्त-सा क्यों है?
समझना नहीं चाहता वह —
'एक को आहत कर
दोष उसी पर मढ़
और अब दूसरे की बारी पर
निश्चिन्त गुज़र कर'
अपनी 'ऊर्जा की सार्थकता'!

शनिवार, 21 अगस्त 2010

पुरानी कविता

mailto:pratulvasistha71@gmail.com
[ये कवितायें कभी मैंने नई कविता के विरोध में लिखी थीं और उसमें अपने बचपन के चित्र डालकर खुश हुआ था. मैंने अपने इस प्रयास को 'पुरानी कविता' नाम दिया था.]
[१]
"उई"

छील सरकंडा
लगा था ब्लेड
ओड़े हाथ में.
'लाल' आया खून
मैंने —
'उई' बोला साथ में.

[२]
टोबा

ले गया 'टोबा'
कलम से
वो मेरी दवात से.
शरारती है
खींचता अब
बस्ता मेरा लात से.

[३]
सुलेख

तख्ती लिखी थी
इसलिए तो
अब हमारा है सुलेख
रोज़ाना गाची मली थी
इसलिए तो
नये लिखकर
जलाता हूँ.
मैं पुराने लेख.

[मेरे बचपन के साथी 'दीपक', 'मुन्नम' और 'चाँद' के साथ बिताये लम्हों को याद करते भाव-चित्र]
ये सभी सौलह वर्ष पुरानी रचनाएँ हैं.

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

आइये और ......"बैठ जाइये"

pratulvasistha71@gmail.com

भारतीय लोकसभा में सबसे अधिक बोला जाने वाला शब्द "बैठ जाइये" है.
कहते हैं सभ्य वह होता है जिसे सभा में बैठने का सलीका आता हो.
'सभ्य' शब्द 'सभा' से निर्मित है. इसका सीधा अर्थ है सभा में बैठने योग्य. 
सभा में वही बैठने योग्य है जिसे 'सभा' में बैठने के तौर-तरीके आते हों. 
देश की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण सभा 'लोकसभा' जहाँ नीति-निर्धारण और बनी-बनायी नीतियों की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर समय-समय पर बातचीत होती है, नीतियों के असफल होने पर उसमें सुधार करने के लिए संशोधन भी किये जाते हैं. हम नयी नीतियों के निर्माण के लिए प्रयास भी होता देखते हैं. प्रयास के रूप में .... वही धमाचौकड़ी, वही जूतम-पैजार, वही मारामारी, वही गाली-गलौज, वही आरोप-प्रत्यारोप जिसे शुरू हुए संसद-सत्रों में आम-जनता देश के कर्णधारों के बीच होते देखती है.
एक विचित्र-सी स्थिति देखता हूँ लोकसभा में. ...
हाँ यह सही है कि अपनी बात अपनी बारी पर कही जाए, इससे सभा में अराजकता नहीं फैलती. मुद्दे पर बात भी हो जाती है. 
लेकिन जहाँ बहुमत वाली सरकार जंगली कुत्तों* की तरह विपक्ष पर पिल पड़ी हो तब मन में तमाम तरह के सवालों को लेकर आये विपक्षी सांसद  अपने को बेफकूफ बनता देख बौखला जाते हैं. और समय-असमय असभ्यता कर बैठते है.

हाँ, नेताओं में अधिक धीरज होना चाहिए. बिलकुल सही बात है. यह धीरज कभी-कभी इतना लंबा हो जाता है कि सभा-विसर्जित हो जाती है, और यदि यह धीरज और धैर्यवान हुआ तब तो पूरा सत्र ही समाप्त हो जाता है.

"धैर्य" ....... विपक्षी पार्षद "धैर्य".
"धैर्य" ....... विपक्षी विधायक "धैर्य".
"धैर्य" ....... विपक्षी सांसद "धैर्य".

"बैठ जाइये" और अपनी बारी का इंतज़ार करिए.
अपनी बात शान्ति से कहिये. अभी 'ओनेरेबल मिनिस्टर जी' बोल रहे हैं.......... बैठ जाइये.

"बैठ जाइये" ........ "बैठ जाइये"  ..........."बैठ जाइये"
शोर मत करिए, 'बैठ जाइये" .......... "बैठ जाइये" .
यह देश की सबसे बड़ी सभा है ........ "बैठ जाइये".

* एक शेर का शिकार तो छह जंगली कुत्ते भी मिलकर कर लेते हैं. इस बात के मद्येनज़र ही विपक्षी सांसद को दबाने की बात की है. इन जंगली कुत्तों में ..... 'मंत्री', 'स्पीकर' का पक्षपातपूर्ण-व्यवहार, 'मार्शल' का सतत खौफ, सत्ता-पक्ष का भूतिया माहौल (हौवा), अपनी पद-निरस्तता का डर शामिल हैं.]

हमें इस सभा से ही अपेक्षा रहती है कि सभ्यता बरकरार रहे और वहीं............यह ......... असभ्य..ता.

[लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार को समर्पित]

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

कीचड़

[बारिश में चारों तरफ पानी और कीचड़ ने मुझे अपने अंतरतम में बने कीचड़ की याद करायी. और फिर मैं अपनी नज़रों में शर्म से पानी-पानी हुआ.]

किन शब्दों में स्वीकार करूँ
अपराध भावना मैं मन की
.................."मैं पापी हूँ"
— बस इतने से न बात अलम.

'रो पड़ी'
विवश होकर गुडिया.

आँसू आये
आँसू में घृणा
घृणा मुझसे
.......ना, नहीं
शायद, मेरे दुर्भावों से.

आँसू में
'अपनापन अभाव' की पीड़ा
किसको अपना वह कहे यहाँ
हर वस्तु उसे
..............'मौसी घर' का
..............'शो-पीस' लगे.

हमने अपनेपन का
अन-अर्थ बना डाला खुद ही.

वह नहीं बोलती
............ अथवा
है नहीं ज़रुरत
— सचमुच
उसको किसी वस्तु की.

कैसे मानूँ —
वह खुश है,
— स्वतंत्रमना है.

रवि अस्त
घूमता हस्त
पाप का तम में
छूने को गुड़िया के कपोल
— वात्सल्य किवा अपराध सोच?

रवि उदय अभी होने में बाक़ी
एक प्रहर
कालिमा और घहराती
जाती है सत्वर.

'पापों के मेरे नहीं थाह'
चाहे लिक्खूँ दीवारों पर
— शान्तं पापं —
हर जगह स्वयं के सम्मुख
वह नहीं शांत होते हैं पर
(सीमित कविता तक
वह तो केवल).

स्पर्श कर रहा था मैं
सारे तोड़ बंध
संयम, मर्यादा, लोक-लाज,
बकवास जान पड़ते थे.
— गुड़िया करे शयन —

पड़ गयी पता
'आवश्यकता'
क्या है गुड़िया की.
जो रही छिपा
— लज्जा कारण —

'मुझे छोड़ वहीं आओ (वापस)'
— पीड़ित करते हैं शब्द —

वह तप्त अश्रु
नन्हें हाथों से पोंछ रही.

पर,
पोंछ नहीं पाती
विश्वासों के
नयनों की
'कीचड'

[शायद मैं अपने मन की चिकित्सा करने निमित्त यह भाव सार्वजनिक कर रहा हूँ.]

शनिवार, 14 अगस्त 2010

मातृभाषा : प्रयोग से विकास की आशा

"जब तक मातृभाषा को उच्च शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया जाएगा, तब तक पाठ्य-पुस्तकें कैसे लिखी जायेंगी, नयी शब्दावली कैसे बनेगी? भाषा का विकास उसके प्रयोग से ही होता है."
— विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर

यह हमारे देश का दुर्भाग्य व उसकी विडंबना ही कही जायेगी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पचास साल बाद भी अंग्रेज़ी-प्रेम में कोई कमी नहीं आई है. अंग्रेज़ी-भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने के सम्बन्ध में अंग्रेज़ी भाषा के पक्षधर निम्न तर्क देते हैं —
[१] सभी जातीय भाषाओं में अत्यंत सीमित शब्द-भण्डार हैं जो विभिन्न क्षेत्रों, विषयों आदि का ज्ञान देने में असमर्थ हैं.
[२] भारतीय भाषाओं में ज्ञान, विज्ञान की उपयोगी पुस्तकों का अभाव है जिससे बच्चों का ज्ञान अधूरा रह जाता है.
[३] सच्चे अर्थों में अंग्रेज़ी भाषा विश्वव्यापी है. इसके माध्यम से ज्ञान अर्जन में अधिक सुविधा होती है.

............ इन तर्कों पर यदि ध्यान से विचार किये जाए तो ये सारे तर्क निरर्थक व थोथे सिद्ध होते हैं. यदि किसी भाषा को अनुपयोगी मानकर दूसरी भाषा को महत्व दिया जाए तो उस भाषा का न तो विकास हो सकता है और न उसके शब्द-भण्डार में वृद्धि हो सकती है.                                                            [यह मेरे मौलिक विचार नहीं हैं]

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

मातृभाषा अभाव : ज्ञान का रिसाव

"मातृभाषा द्वारा शिक्षण के अभाव ने भारत को निश्चय ही विश्व के सभ्य देशों में, अत्यंत अज्ञानी बना दिया है. यहाँ उच्च शिक्षा-प्राप्त व्यक्तियों की संख्या काई-भर है जबकि अशिक्षितों की अपार जल-राशि है."
— श्रीमती ऐनी बेसेंट

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

मेरी दो अ-कवितायें

[१]

मेरी 'नमस्ते' का भूखा

जब भी उससे
नयन मिलते हैं
कुछ अपेक्षा से
उसके नयन ठिठक जाते हैं.
चाहते हैं कि
मेरे नयन
पल भर को
पलकों के हाथ खड़े कर
तपाक से 
गिर पड़े
अपने क़दमों में.

ऐसे में
उसके भूखे कान
सुनने को उतावले
रहते हैं कि
मेरा मुख
उसके कमेन्ट बॉक्स में
'नमस्ते' का
ऑडियो मैसेज छोड़ जाए.

[२]

मेरा बड़प्पन

मेरे बाद जन्मे लोग
मेरी बात क्यों नहीं मानते?

मेरे अनुभव
मेरी उपलब्धियों से लाभ क्यों नहीं उठाते?

क्यों नहीं बैठते
आकर मेरे पास?

क्यों बनी रहती है
हमारे बीच
दो पीढ़ियों की दूरी?

मेरे मन में
इन सभी उठते सवालों के बीच
माँ की आवाज़ ने दस्तक दी .....
"बेटा! मंदिर जाना,
पुजारी के पाँव छूकर आशीर्वाद ले लेना.
भगवान् चाहेगा तो इस बार ....."

तपाक से मेरे भीतर
बैठे बड़प्पन ने जवाब फैंका —
"नहीं माँ, अपने मंदिर का पुजारी
मुझसे उम्र में छोटा है."

मातृभाषा प्रयोग मतलब मानसिक स्वतंत्रता

"केवल एक ही भाषा में हमारे भावों की व्यंजना हो सकती है, केवल एक ही भाषा के शब्दों के सूक्ष्म संकेतों को हम सहज और निश्चित रूप में ग्रहण कर सकते हैं. यह भाषा वह होती है जिसे हम अपनी माता के दूध के साथ सीखते हैं, जिसमें हम अपनी प्रारम्भिक प्रार्थनाओं और हर्ष तथा शोक के उदगारों को व्यक्त करते हैं. दूसरी किसी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना - विद्यार्थी के श्रम को अनावश्यक रूप से बढ़ावा देना ही नहीं, बल्कि उसकी मानसिक स्वतंत्रता को भी पंगु बना देना है."
— अंग्रेज़ी साहित्यकार ब्रेल्सफोर्ड

बुधवार, 11 अगस्त 2010

मातृभाषा : माता का दूध

"मनुष्य के विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितना कि बच्चे के शारीरिक विकास के लिए माता का दूध. बालक पहला पाठ अपनी माता से ही पढता है, इसीलिए उसके मानसिक विकास के लिए उसके ऊपर मातृभाषा के अतिरिक्त कोई दूसरी भाषा लादना मैं 'मातृभाषा' के विरुद्ध पाप समझता हूँ."
— मोहनदास करमचंद गांधी

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