बुधवार, 17 नवंबर 2010

रहम करो परवरदिगार

मुझे बचाओ ..... मुझे बचाओ 
............ चीखें आती कानों में 
लेकिन उन चीखों की .. ऊँची 
........... कीमत है दुकानों में.


अल्लाह किस पर मेहरबान है 
........ समझ नहीं है खानों में. 
ईद मुबारक ..... ईद मुबारक 
.......... बेजुबान की जानों में.


रहम करो ...... परवरदिगार 
पशु कत्लगाह - ठिकानों में. 


क़त्लो-ग़ारत ख़ुद करे , मज़हब का ले' नाम !

ज़ुल्म-सितम का कब दिया अल्लाह ने पैग़ाम ?!

अल्लाह तो करते नहीं कभी ख़ून से स्नान !


करे दरिंदे-जानवर ,या शैतान-हैवान !! 



— राजेन्द्र स्वर्णकार 


खानों — खान का बहुवचन 
दूसरा  अर्थ — भक्ष्य-अभक्ष्य में हमें अपने भोजन की ही समझ नहीं रही. 
अल्लाह किस पर मेहरबान है हम पर या बेजुबान जानवरों पर?

27 टिप्‍पणियां:

  1. प्रतुल जी,

    प्रभावशाली सार्थक समयानुकूल प्रस्तूति!!

    समझ कहीं भी जा बसे, बस उर में करूणा बसनी चाहिए।

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  2. रहम करो ...... परवरदिगार
    पशु कत्लगाह - ठिकानों में.

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  3. बहुत ही सही कहा....
    काश कि लोग धर्म को सच्चे अर्थों में समझ पाते ...
    करुनाहीन धर्म क्या मानवता को बचा पायेगा ???

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  4. Very nice post, Aaj ke jamane main is tarah ki aawaj uthana jyaj hai, ab koi baba adam ka jamana to hai nahi

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  5. शायद आपको इन बेचारे जानवरों की ही आवाज़े सुनाई देती हैं, क्योंकि वह बोल सकते हैं. लेकिन उन बेजुबान पेड़, पौधों, सब्जियों की आवाजें सुने नहीं देती. और ना ही शायद चलते हुए अनजाने में पैरों के नीचे दफ़न हो जाने वाले करोडो जानवरों की और ना ही मच्छर, मक्खियों, कोक्रोचों की? क्योंकि यह अनजाने में ही नुक्सान पहुचा देते हैं मनुष्य नामक महान प्राणी को?

    और ना ही मुर्दा इंसान के साथ उसके शरीर में वास करने वाले असंख्य जीवों की आवाजें कभी आपको सुनाई देती हों जो की उस बेजान शरीर के साथ ही जल जाने को मजबूर हो जाते हैं.

    या आप केवल दिखाई और सुनाई देने वाले बातों में ही विश्वास रखते हैं?

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  6. परवरदिगार अभी चिरनिद्रा में लीन हैं..उनके कानों तक ये रहम की फरियाद नहीं पहुँचने वाली :)

    ये भी अच्छा रहा कि आपने "खानों" का अर्थ स्पष्ट कर दिया...वर्ना हम तो इसे "दिमाग के खाने"(दाएं-बायें हिस्से) ही समझते :)

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  7. एक बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण कविता.

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  8. एक बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण कविता.

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  9. ..

    समझ कहीं भी जा बसे, बस उर में करूणा बसनी चाहिए।
    @
    सुज्ञ जी,
    "समझ नहीं है ... खानों में" से मेरा तात्पर्य है कि खान भाइयों में,
    फिर दूसरा अर्थ भी साथ चिपका चला आया
    अब देखता हूँ कि आदरणीय वत्स जी ने एक तीसरा अर्थ भी कर डाला है.
    खाने मतलब दिमाग के चेतन, अचेतन, अवचेतन हिस्से.
    मैं तो अपना आक्रोश व्यक्त करने में इति समझ रहा था
    यहाँ तो समझ ही विस्मित हो रही है 'खानों' के इतने अर्थ देखकर.

    हाँ आप ह्रदय में करुणा बसने की बात बताना नहीं भूले. आभारी हूँ.

    ..

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  10. ..

    दीपक सैनी जी,
    आज के खोखले सौहार्दपूर्ण वातावरण में आपने मेरी कथित सांप्रदायिक कविता को सराहा, मुझे हिम्मत मिली अपने आक्रोश को आगे भी बिना संकोच सम्पूर्ण सत्य के साथ रखने की.

    ..

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  11. ..

    पुरविया जी,
    परवरदिगार से मेरी याचना में आपने भी सुर में सुर मिलाया अब इन सुरों से उन बेसुरों को ठीक करना है जो हिमायती हैं मांसाहार के.
    आपका स्लोगन भी है "कुछ भी असंभव नहीं है" मेरा भी मानना यही है.

    ..

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  12. ..


    अमित जी,
    आपने मेरा हमेशा साथ दिया. विचारों को प्रसारित करने में, उसे चर्चा रूप में मंच पर सम्मान पूर्वक स्थान देने में
    मेरा इस ब्लॉग को निर्मित करना और इसकी काव्य (शब्द)-थैरेपी को स्थापित करना सार्थक हो गया.
    मैं समस्त पुण्यों को एकत्र करके आपके सद्कार्यों में साथ निभाने का वचन देता हूँ.

    ..

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  13. ..

    दिव्या जी,
    आपके मौन स्नेह और कम शब्दों को विस्तार लेने की आवश्यकता नहीं लगती क्योंकि मुझे आपके समस्त भाव और विचार स्पष्ट हैं.
    करुणा ह्रदय में जीवमात्र के लिए भरी है. जो ह्रदय एक मामूली से अनिष्ट की चिंता से ही व्याकुल जो जाए वह कर्म से की गयी हिंसा से तो मूर्छित हो जाएगा.
    ___________
    आपसे जब संवाद करता हूँ तो कलम को रोकना पड़ता है. वह रुकना नहीं चाहती.

    ..

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  14. ..

    रंजना जी,
    मुझे याद है .....
    आपने मुझे पिछली ईद पर भी सराहा था
    और इस ईद पर भी... मेरे भावो में अपने समभाव जोड़कर
    इस बात को पुष्ट कर रहे हैं कि
    मानवता और पशुता में कुछ तो भेद होना ही चाहिए.
    यदि ह्रदय में करुणा हो तो 'ईद' जीवमात्र के लिए खुशियों का त्यौहार होगा.

    ..

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  15. ..

    तारकेश्वर जी
    आपने खूब कहा 'कोई बाबा आदम का ज़माना तो है नहीं" जो हम आज के समय में मांसाहार का विरोध न करें.

    ..

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  16. ..

    मित्र संजय जी,
    क्या करूँ दोस्त, मुझे बीन बजाने में मज़ा आता है. कभी-कभी तो मैं तबला भी बजाता हूँ. मैंने मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग जो ली थी.

    वक्त आने पर बता देंगे तुझे अय मौसमाँ !
    हम अभी से क्या बताएँ, क्या हमारे दिल में है?

    ..

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  17. ..


    शाह नवाज जी
    मैं आपके समस्त प्रश्नों के उत्तर बहुत सरलता से दे सकता हूँ. किन्तु आप पहले आश्वासन दें और कसम खायें कि यदि आपको सभी उत्तर तर्क सहित मिल गए तो आप मांसाहार त्याग देंगे. और अपने भाइयों से भी मनवायेंगे. यदि ऐसा नहीं है तो मैं असफल प्रयास क्यों करूँ? भुस्से में लाठी क्यों मारूँ.

    ..

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  18. ..

    वत्स जी,
    चरणवंदन!

    कुकुरान में आया है "जब कोई कुक्कुर मांस का त्याग कर देता है तब परवरदिगार की चिरनिद्रा स्वाननिद्रा में तब्दील हो जाती है. मतलब हाजमा सही हो जाता है." [ देखें : कुकु. भा. २, आयत ४२०. पन्ना ७८६ ]
    हमारी रहम की फ़रियाद डंके की चोट पर पहुँचेगी,
    जब हम उलटी बातें बोलेंगे और उलटा लिखना शुरू कर देंगे. उलटे काम करेंगे तो अवश्य पहुँचेंगी.
    गुरुजी, कृपया आप आड़े वक्त में साथ दीजिएगा. वैसे हम उलझने वालों में नहीं हैं. फिर भी गुरु का हाथ सिर पर रहता है तो शिष्य अच्छा निशाना लगा लेते हैं.

    ..

    उत्तर देंहटाएं
  19. ..

    मेरे बचपन की साथी विचार शून्य सदाबहार दीपक
    आपने मांसाहार का समर्थन करके सही नहीं किया. इस सन्दर्भ में मुझसे पहले बात की होती तब मैं आपको उन अकाट्य तर्कों से परिचित कराता जो मांसाहार का पूर्णतया वर्जन बताते हैं. लेकिन अब मैं उन तर्कों को तभी खोलूंगा जब आप खुलकर मांसाहार के विरोध में सामने आने का वचन देंगे.

    बीडी पीने वाले यदि ये कहें की 'ये स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं' तो मुझे उनकी वो बात झूठ लगेगी ही.

    ..

    उत्तर देंहटाएं
  20. परम स्नेही परम आदरणीय प्रतुल जी
    सादर-सस्नेह अभिवादन !
    अल्लाह किस पर मेहरबान है अल्लाह सच का अल्लाह है तो इंसानों से तो अधिक समझदार होगा ही होगा !
    … और निस्संदेह अल्लाह अल्लाह है
    ज़रूरत है तो बंदों को उसे समझने और ईमानदारी से इंसान बनने की ।
    मेरी लेखनी कहती ही रहती है -
    क़त्लो-ग़ारत ख़ुद करे , मज़हब का ले' नाम !
    ज़ुल्म-सितम का कब दिया अल्लाह ने पैग़ाम ?!

    अल्लाह तो करते नहीं कभी ख़ून से स्नान !
    करे दरिंदे-जानवर ,या शैतां-हैवान !!

    बहुत कुछ है कहने करने को …
    अभी इतना ही कहूंगा -
    सबको सन्मति दे भगवान !

    सदैव आपका ही और हर इंसान का
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  21. परम स्नेही परम आदरणीय प्रतुल जी
    सादर-सस्नेह अभिवादन !
    अल्लाह किस पर मेहरबान है अल्लाह सच का अल्लाह है तो इंसानों से तो अधिक समझदार होगा ही होगा !
    … और निस्संदेह अल्लाह अल्लाह है
    ज़रूरत है तो बंदों को उसे समझने और ईमानदारी से इंसान बनने की ।
    मेरी लेखनी कहती ही रहती है -
    क़त्लो-ग़ारत ख़ुद करे , मज़हब का ले' नाम !
    ज़ुल्म-सितम का कब दिया अल्लाह ने पैग़ाम ?!

    अल्लाह तो करते नहीं कभी ख़ून से स्नान !
    करे दरिंदे-जानवर ,या शैतां-हैवान !!

    बहुत कुछ है कहने करने को …
    अभी इतना ही कहूंगा -
    सबको सन्मति दे भगवान !

    सदैव आपका ही और हर इंसान का
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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