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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

तोन्दूमल का झोला


चुरा खेत से बन्दर जी ने
लिया एक तरबूज़
छूट गया पानी के अन्दर
हाथ हुए जब लूज़

दरियायी घोड़ा जल्दी से
पानी में घुस आया
हुई छपाक, लपककर उसने
भारी तरबूज़ उठाया

कछुए जी आराम कर रहे
कीचड़ बीच किनारे
भूख-प्यास से परेशान थे
गरमी से दुखियारे

पीठ फेर दरियायी घोड़ा
कछुए से कतराया
खुद ही सब खा गया अकेले
बन्दर भी खिजियाया

खा-पीकर दरिया का घोड़ा
मुँह पोंछकर बोला
मुझपर था तरबूज़ रखन को
तोन्दूमल का झोला.



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नयी दिल्ली, India
समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.