रविवार, 9 मई 2010

बौनी पीढ़ी


 
गमलों में

उग आये हैं
नीम बेल अनार इमली के पेड़.

गमलों में
पेड़ों को उगा देख
बसे-बसाए 'फूल से'
किराएदारों को मैंने विदा किया.

माँ ने समझाया
गमलों में पेड़ नहीं लगते.
पेड़ों को चाहिए होती है ज़मीन
अधिक क्षेत्रफल/ खुलापन
बेटा, पौधों को गमलों से मत निकालो
मत बसाओ पेड़ों को गमलों में.

मैंने कहा —
माँ! ये गमलों में बौने ही रहेंगे
मैं इन्हें खाद पानी दे ज़िंदा रखूँगा.
ये पेड़ उगाने का बौन्साई फार्मूला है – कम स्पेस में.
आजकल इसी का फैशन है
घर-घर उगाये जा रहे हैं इसी नीति से पेड़.
कुछ सालों बाद ये फल देने लगते हैं.

पिता ने कहा —
"बेटा! इनके फलों में स्वाद नहीं होगा
असली जैसा"

कमरे के भीतर से आता 'बच्चों का शोर' सुन
पिता की बात को अनसुना करने का
मुझे कल्चर्ड बहाना भी मिल गया.
— पापा सर्कस जाना है.
— पापा 'पा' देखने चलो.
पत्नी का दोनों बच्चों को पूरा सपोर्ट था

सो, पहले सर्कस
फिर फिल्म/ बारी-बारी से जाना हुआ.

पहला 'शो' सर्कस
जहाँ
बच्चों के कद में
समाहित थे पूरे के पूरे आदमी/
उनका चलना, उनका घूमना/
उनका उठना-बैठना, झूमना
बच्चों की हँसी को कंटीन्यू किये था.

समाज में जब हम देखते हैं किसी को
उम्र से घट-बढ़ हरकतें करते देखते
– हँसी छूट जाती है.
पर यहाँ तो उम्र अपनी सही जगह लिए है
कद ही नहीं है अपने ठिकाने पर.
"बौना"
परमात्मा का 'अनफेयर' 'अमेच्योर सृजन
फिर भी उसको देख
हँसी आ जाती है क्यों?

दूसरा 'शो'
३ से ६ "पा"
"ओरो"
प्रोगेरिया का शिकार
 परमात्मा का अनजस्टिस/
इकतरफा प्रोग्रेस
जिसमें शरीर तेज़ी से महीने-दर-महीने उम्र की दहलीज़ें लांघता है.
 पर पिछड़ जाती है अक्ल, उम्र के मुताबिक़.

'पा' के बाद से ही समाज में सुन्दर महिलाओं के नज़रिए में दिखने लगा था बदलाव.
जो कभी किसी वृद्ध व्यक्ति के घूरने पर बिदक जाया करती थीं घरेलू औरतें/
अब वही खोजने लगीं हैं हर बूढी घूरती नज़रों में छिपा हुआ 'बच्चा' प्यार से.
सच में 'पा' का क्रांतिकारी असर है.


सर्कस और फिल्म देखने के बाद
घर लौट आया मैं खयालों में

'मनोरंजन' एक खाद है
जो थोड़ी मात्रा में दी जाये तो
थके मस्तिष्क को रिलेक्स देती है.
नयी ऊर्जा से पुनः भर देती है.'
पर मनोरंजन की हवस
किस तरफ ले जाती है
समझ नहीं आता.
क्योंकि तब तक दिमाग सोचने लायक नहीं रहता.
मनोरंजन में बहते जाना बहते जाना
जरूरत सी लगने लगती है.
क्रिकेट मैच देखने से छूट जाए
तो उसके हाईलाइट्स देखने बेहद ज़रूरी हैं.
चाहे दिनभर ऑफिस में आँखें
कम्पूटर के आगे थकाई हों.
देश की कौन-सी विधान-सभा में
हंगामा हुआ/ जूतम-पैजार हुआ/
किस नेता की जोकरी का कारनामा
आज पूरे दिन चैनल्स पर छाया रहा.
किस छोटे कद के नेता ने बड़े बोल बोले.
किस गुदड़ी में छिपे संत के
उसके भक्त ने सारे राज़ खोले.
खबर मालूम पड़ने पर भी
बार-बार फिर-फिर
मर्डर-मिस्ट्रीयों में
मनोरंजन खोजते रहना.

-- कहाँ करें मनोरंजन का अंत.
कैसे दें आखों को आराम/
दिमाग को दो क्षण सुकून के. ...
सोचता-सोचता कब मैं
घर के टी वी के सामने
आ बैठा पता ना चला.


टी वी पर चल रहा था
'डांस-इंडिया-डांस' के जूनियर्स शो ऑडिशंस.
सभी माता-पिता अपने-अपने बच्चों से
युवक-युवतियों के शारीरिक भावों की
उलटी करवा देना चाहते थे.

खैर, मैंने
सुबह से शाम तक
और रात को भी
हर कहीं होते देखी
बौन्साई खेती.
घर की बालकोनी और छतों से लेकर
घर के अन्दर माँ की गोद तक में.

जब मैं नहीं छोड़ पा रहा हूँ
पेड़ों को गमलों में लगाने के शौक को.
तो क्यों उम्मीद करूँ
छोड़ देंगे बाक़ी भी
बोनसाई फार्मूले से
बच्चों को पोसना.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ल........... ...म्बी कविता और लोगों का बौनापन । प्रतुल बहुत ही उम्दा सोच और अपने इर्द गिर्द की परिस्थितियों को देखने की आपकी पैनी नजर। और सबसे महत्वपूर्ण बात , अपने विचारों को सरल भाषा में प्रकट करना। बहुत अच्छा लगा।

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