शनिवार, 24 अप्रैल 2010

चुपचाप देखो मेरा दूसरा जन्म

जब अमित जी ने प्रकृति के एक नज़ारे को मेरी नज़र से जानना चाहा ...
उनका लिंक है:  http://27amit.blogspot.com/2010/04/blog-post_23.html


"आज आपके पास
आश्चर्य करने के अलावा कुछ नहीं."


देखो! शुरू हो गया है मेरा
— स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढना.
— मज़बूत चट्टान से कंकणों में बदलना.
— कंकणों से रेत में तब्दील होना.

'कंकणों का एकजुट हो जाना'
लम्बे समय बाद चट्टान रूप में पहचाना जाता है.


यह तो मेरी नियति है.
प्रकृति की निरंतर चलायमान
बहुत ही धीमी गति है.


यदि यह गति धीमी ही हो
तो मुझे कष्ट नहीं होता.
जैसे शिशु 'अकाल वृद्धावस्था' को प्राप्त नहीं होता.
बीच में जी लेता है 'चंचल बचपन''
जीता है 'प्रशिक्षु किशोरावस्था'
भोगता है 'उर्जावान यौवन'
उतारता है अनुभवपरक प्रौढ़ता
और अंत में,
बिछा जाता है अपने समाज में
अपनी क्षमताओं के साथ
अलग-अलग अनुपात में
नैतिक मूल्यों की,
रीति-रिवाजों के धागों से बुनी,
रंगीन छापों से संस्कारित
'विरासत की चादर'.


अब मेरे भीतर तक नहीं है
एक भी जलकण.
जो मेरे प्रत्येक कण को
परस्पर थामे रखने का कारण था
मेरा आकर्षण था
मैं उसके पास जब भी जाता
वह अपनी अलग पहचान खो देता
मुझसे तादात्म्य कर मुझमें विलीन हो जाता.
'यह प्रक्रिया' मेरे लिए 'प्रेम' थी.


मेरे प्रेम को मुझसे किसने छीना?
कौन उसका हरण कर गया?
किसने मेरी अन्तर्निहित
जलीय भावनाओं को वाष्पित कर दिया?


— क्या मानवीय कृत्यों ने?
या फिर विधाता की इच्छा ने?
— अरे कहीं सचमुच तो मेरा स्वाभाविक क्षरण नहीं हुआ?
अथवा नए रूप पाने को हो रहा है मेरा गमन.


करो आश्चर्य, क्योंकि मैं बहने लगा हूँ.
करो आश्चर्य, क्योंकि मैं स्थिर नहीं.
करो आश्चर्य, क्योंकि आपने अभी जाना है.
अंश और अंशी के सम्बन्ध को पहचाना है.


आत्मा का विलय परमात्मा में होता है.
क्या मैं अपने चट्टान रूप को बिना रेत किये विलीन हो सकता हूँ?
यदि नहीं, तो आश्चर्य किस बात का
मुझे भी तो सद्गति चाहिए, मोक्ष चाहिए.
नए रूप पाने को इस प्रक्रिया से निकलना ही होगा.
मुझे शान्ति से नया आकार पाने दो
हो-हल्ला न करो
इस हो हल्ले से शांत ठहरा समीर गदला हो जाएगा.
नयी सोच का बुद्धूजीवी [बुद्धिजीवी]
ग्लोबल-वार्मिंग, ग्लोबल-वार्मिग चिल्लाएगा.
इसलिए
चुप! ... शांत!!
चुपचाप देखो मेरा दूसरा जन्म.

1 टिप्पणी:

  1. मुझे शान्ति से नया आकार पाने दो
    हो-हल्ला न करो
    इस हो हल्ले से शांत ठहरा समीर गदला हो जाएगा.
    नयी सोच का बुद्धूजीवी [बुद्धिजीवी]
    ग्लोबल-वार्मिंग, ग्लोबल-वार्मिग चिल्लाएगा.
    इसलिए
    चुप! ... शांत!!
    चुपचाप देखो मेरा दूसरा जन्म.

    आगे आगे देखिये होता हो क्या >))

    उत्तर देंहटाएं

मेरे पाठक मेरे आलोचक

Kavya Therapy

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
नयी दिल्ली, India
समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.