सोमवार, 15 अगस्त 2011

वाह रे आज का प्रजातंत्र !!

वाह रे आज का प्रजातंत्र 
घूमते सब गुंडे स्वतंत्र 
हाय फैला कैसा आतंक 
लगे हैं रक्षक-भक्षक अंक 
पुलिस पर एक बड़ा है मन्त्र 
किसी को पीट करें परतंत्र 
घोर है उनका अत्याचार 
रोंये सब जन-जन हो लाचार
बनाया था जिनको सरताज 
वही सर चढ़े हुए हैं आज 
लूटते लाज करें दुष्काज
गिरी न अब तक उनपर गाज.

प्रभु, एक विनती है सुन लो!
हमें तुम ऐसे रक्षक दो 
जो भक्षक के भक्षक हों.
या फिर,
करें ये राज, करें ये राज 
शीघ्र आयें हरकत से बाज 
नहीं तो हो जाएगा नाश 
हमारा ये सुन्दर समाज.

['लोकतंत्र' जीवित रहे ........ आओ ऎसी कामना करें.]

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह भ्रष्‍टतंत्र है। इसके सिरपरस्‍त कांग्रेसी हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय अजित जी,
    ये मेरे बाल-काल की रचना है... मेरे लिए तब ताकतवर पुलिस ही हुआ करती थी. मुझे सरकार 'पुलिस' में ही दिखायी देती थी.
    इसलिए आज पुलिस रूप में ही मैं प्रशासन और कांग्रेस को देख रहा हूँ.

    उत्तर देंहटाएं

मेरे पाठक मेरे आलोचक

Kavya Therapy

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
नयी दिल्ली, India
समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.