शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

तनाव की तपन

कविता ने है कर दिया 
मेरा कंठ अवरुद्ध. 
भ्रष्ट राग गाता फिरा 
नहीं हुआ कुछ शुद्ध. 

नहीं हुआ कुछ शुद्ध 
तनाव की तपन झुलसता. 
सत्य सूर्य को आज़ 
भ्रष्ट बादल भी ग्रसता. 

4 टिप्‍पणियां:

  1. .

    भ्रष्ट चाहे नेता हों अथवा बादल , उनकी सत्ता अल्प कालिक होती है । सत्य के तेज कों ग्रस लेने जितना दम-ख़म उनमें नहीं होता ।

    नहीं क्लांत करो तुम मन कों , इन दुःख तनाव से ,
    हर घटना सुन्दर पाठ है , बस देखो शांत भाव से ।

    .

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  2. .

    नहीं क्लांत करो तुम मन कों, इन दुःख तनाव से,
    हर घटना सुन्दर पाठ है, बस देखो शांत भाव से।
    — ये सर्वोत्तम औषधि है.

    @ प्रेम प्रेरक बोल से तनाव की हो तपन कमतर.
    किन्तु व्रण एकांत पाते पीड़ा से कराह उठता.

    दिव्या जी,
    आपकी पंक्तियों में इस बार मुझे महाकवि मुख वचन की अनुभूति हुई है.
    क्या ये पंक्तियाँ किसी अन्य महाकवि की तो नहीं?

    .

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  3. .

    संजय जी
    नमस्ते.
    कवि अपने समस्त तनावों को कविता से ही विरेचित करता है.
    चाहता तो वह समस्त समस्याओं का निराकरण भी इसी थेरेपी से है. किन्तु यह थेरेपी किसी कम्पनी कोर्पोरेट आदि में मान्य नहीं.

    .

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