रविवार, 26 सितंबर 2010

नित्य प्रार्थना


विद्या विलास में हो तत्पर 
मन, शील हमारा हो सुन्दर 
तम, भाष हमारा सत्य सहित 
मन, मान मलिनता से हटकर. 

यम नियम आदि का हो पालन 
वैदिक कर्मों से भला इतर. 
जग जन-जन के दुःख दूर करे 
ऐसी विद्या देना हितकर. 

[एक परित्यक्त अर्चना, जो चिकित्सा के लिए 'काव्य थेरपी' औषधालय आ गयी.]

विद्या विलास मनसो धृत शील शिक्षा  
सत्यः व्रता, रहित मान मलाप हारः
संसार दुःख दलनेन सुभूषिता ये 
धन्या नरः विहित कर्म परोपकारः

7 टिप्‍पणियां:

  1. ये ना समझना यूं ही बक दिया. समझ आया है तभी कहा है.

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  2. प्रतुल जी,
    बहुत अच्छा लिखते हो आप, सच में।

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  3. अरे यह तो आपकी चिकित्सा पाकर और भी निखर गयी है

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  4. मित्र संजय,
    इस बार नीचे से तो नहीं पढ़ा था___ आदतानुसार.
    खैर, छोटी रचना का फायदा यही है कि उसे नीचे से शुरू करने की नही सूझती......... जानता हूँ.
    _______________
    आपका धन्यवाद रचना की तारीफ़ के लिए.

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  6. मित्र अमित
    मुझे श्रीमन आनंद पाण्डेय जी ने संस्कृत ब्लॉग लेखन के आमंत्रण दिया था. मैंने संकोच से स्वीकार तो कर लिया है. अब आप ही का आसरा है. विषय-सामग्री उपलब्ध कराने का.
    मुझे कवितायी हिंदी में ही सूझती है. और मैंने वहाँ भी संस्कृत श्लोक के बाद अर्थ की कविताई कर दी लेकिन ब्लॉग के उद्देश्यों को बिना जान उसे संकुचित दृष्टिकोण वाला जाना और अब उसकी शुद्धता को लेकर आश्वस्त हूँ की कोई तो है हमारी देववाणी संस्कृत भाषा को पूर्णतया समर्पित. वहाँ से आहत होकर यह कविता मेरे इस औषधालय पर आ गयी. रचना की उत्पत्ति के बाद उसे मंच न मिले तो वह कुंठित हो जाती है. इसलिए इसे यहाँ प्रकाशित कर दिया. आपकी सराहना मुझे अब अच्छी लगने लगी है क्योंकि जिसका अभाव जो जाए वह जब मिलता है तो अच्छा लगता है ही.

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