बुधवार, 24 मार्च 2010

नंगा सच

"करंट आता है
नहीं छूना उसे"

पड़ोस का बच्चा
कूद फांद कर आया
'फंसी पतंग' एंटीना से छुड़ाने
-- बड़ी उतावली से।

देश की बढ़ती
आबादी
ने मिला दी
हैं, गली की
छतें सारी।

पहले कभी
जब न मिली
थी छत किसी की
सब -- एक थे
-- परिवार से।

अब, हम न सही
छतें सही
-- मिल कर रहें।

एक मंजिल थी कभी
दूसरी बन ही गयी
-- किरायेदारों के लिए।

अब तीसरी मंजिल
बनाने की तैयारी हो रही
है/ भाई-भाभी के लिए।

हम सामने वाले पड़ोसी से
दस मंथ पीछे हैं
-- कंस्ट्रक्शन में।

अब सामने घर के हमारे
ईंट चट्टे में, बदरपुर
रेट, रोड़ी, आयरन
-- बिखरे पड़े।

मेरा लफंगा
भाई छोटा
'कार में' --
न जाने कौन आई, पर कटी
-- घुमाने ले गया।
साथ/ पूसी भी गया है।

मसाला बनाने की मशीन
शोर करती
--'घरड-घरड'
दब गयी आवाज जिससे
--'परड-परड'
बाथरूम के पास वाले
एक छोटे कमरे
से आ रही।

फलाने/ पब्लिक स्कूल का रिक्शा
रुका/ सामने वालों के बच्चे
आ गए/ हैं गुनगुनाते
-- गीत फिल्मी।
गा रही लड़की
अपने अनउगे अंगों का गीत
और लड़का
बेझिझक
चिल्ला रहा -- कुछ पूछता
कुछ वर्ष पहले
थे सामने -- जब दूध पीता
'नासमझ'
अब छिप गए हैं आड़ ले
-- उनके विषय में।

माँ बहुत खुश--
'आये बच्चे गीत गाते'
हैं पड़ोसी
और मैं भी
-- चुप्प --
आदत पड़ गयी है
'गीत सेक्सी' रोज़
सुनने की
-- गली में।

(इस अकविता का जन्म मध्यम वर्गीय सामाजिक परिवेश में मेरी उस विवशता को व्यक्त करता है जिस विरोध को मैं चाहते हुए भी स्वर नहीं दे पाता)

2 टिप्‍पणियां:

  1. वो छतों पर लगे एंटीना । मैं तो भूल ही गया था उनको। यह आपकी बहुत पुरानी कविता है शायद । कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो आई ।
    बहरहाल कविता चाहे पुरानी हो पर आजभी प्रासंगिक है।

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  2. आप तेज दिमाग हैं। पूंछ देखकर जानवर पहचानते हैं। कविता वास्तव में १९९३ की है। कुछ नया नहीं परोस सका तो बासी ही परोसा। लेकिन फिर भी एक उत्तम अथिति की तरह आपने व्यवहार किया। उसे सराहा। धन्यवाद.

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समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.