रविवार, 9 जनवरी 2011

एक कोड़े से करी पिटाई

एक कोड़े से करी पिटाई 
दर्द इसी का है दुःखदाई. 
आगे क्रोध-कुंड है मेरे 
पीछे छल-भावुकता खाई. 

एक पंक्ति में खड़े कर दिए 
दुश्मन और मुँहबोले भाई. 
धूर्त और मक्कार निकलते 
है कैसी ये न्याय-तुलाई? 

खुद का दुःख है पाँव फैलाता 
बन जाता है ताड़ की नाईं. 
और हमारा सिमट गया तो 
समझ लिया सूखी मृत राई. 

जिन पैरों न पड़े बिवाई
वो क्या जाने पीर पराई. 
जो उनके मन का सोचा है 
वही सत्य-पथ, शेष खटाई. 

कोड़ा अलग ले लिया होता 
पी जाते सब तिक्त दवाई.
एक कोड़े से करी पिटाई 
दर्द इसी का है दुःखदाई. 

5 टिप्‍पणियां:

  1. वीर-रस लिखो कवि, यह दयनीय-रस शोभा नहीं दे रहा।

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  2. .

    सुज्ञ जी,
    मुझे नेक सलाह के लिए धन्यवाद. मैं इस काव्य-थेरेपी चिकित्सालय में कभी-कभी अपनी चिकित्सा भी करता हूँ. जो मन में था वह बाहर आना मवाद की तरह मान सकते हैं.
    वीर रस के लिए उत्साह आवश्यक है. वह मुद्दों के सामने आते ही पैदा होगा. कृत्रिम रूप में आनंद नहीं रहता. उत्साह के लिए इंतज़ार करता हूँ.

    .

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  3. शायद कवि नीरज की कविता है…………

    छिप छिप के अश्रु बहाने वालों,
    मोती व्यर्थ लुटाने वालों।
    कुछ सपनो के मर जाने से,
    जीवन नहीं मरा करता है।

    सपना क्या है? नयन सेज पर,
    सोया हुआ आंख का पानी।
    और टूटना उसका जैसे,
    जागे कच्ची निंद जवानी।
    गीली उम्र बनाने वालो,
    डूबे बिना नहाने वालो।
    कुछ पानी के बह जाने से,
    सावन नहीं मरा करता है।

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  4. एक कोड़े से करी पिटाई

    दर्द इसी का है दुःखदाई
    bahut achcha laga.

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नयी दिल्ली, India
समस्त भारतीय कलाओं में रूचि रखता हूँ.