गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कबाड़ीवाला

घर के एक कोने में
कर दी हैं इकट्ठी
घर के सभी सदस्यों ने
— अपनी-अपनी रद्दी.


माँ
महीनों से
जोड़ रही थी जिस कबाड़े को
वह कबाड़ा बिक गया
— पिता की बिना मर्जी.


लास्ट सन्डे
न्यूज़पेपर में छपा जो
एडवरटायिज़ — "फ्लेट एमआईजी बनेंगे".
— खोजते हैं अब उसी को भैया-भाभी.


पिछले हफ्ते ही खरीदा —
"रोज़गार"
वैकेंसी थी — किसी कम्पनी को
चाहिए था 10 वीं पास 'चौकीदार'.


घर में तो मैं
चौकीदारी कर न पाया.
ले गया सब — कबाड़ीवाला.


बहन ने जो सिलने दिए थे सूट
उसकी पर्ची नहीं मिलती.
संदेह रद्दी पर उसे है.
— अब, लौटाएगा न सूट दर्जी.

पिता झल्लाते ढूँढ़ते हैं
'योग की पुस्तक'
वृद्धावस्था पेंशन की
— उसमें रखी थी अर्जी.

माँ थी सचमुच परेशान
शाम तक उसे करना था
— 'इंतजाम'.
इसलिए तो बेची थी रद्दी  
मिलेगा पैसा
तो बनेगी शाम की सब्जी.

कबाड़ीवाला
ले गया अरमान सारे.
मेरा संभावित रोज़गार.
भैया-भाभी के सपनों का घर.
बहन का नया फैशन.
वृद्ध माँ-पिता की आखिरी उम्मीद.
— अब काम किया जाएगा फर्जी.

1 टिप्पणी:

  1. भावुक कर देने वाली कविता...बहुत अच्छे से दृश्य प्रस्तुत किया आपने घर के सदस्यों का......"

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नयी दिल्ली, India
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