मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

आखिरी जिद

मेरे ह्रदय में
पुण्य भी है पाप भी
वरदान भी है शाप भी
बिलकुल अवध के एक ढाँचे सा।

सोचता
सब नष्ट कर दूँ।
फिर से बनाऊं 'एक मंदिर'
शुद्ध, सुन्दर, पुण्य-संचित
यही बालक मन की मेरी
आखिरी जिद।

एक राखूँ
एक अर्पित।
हाथ मेरे
है खिलौना
'श्री राम भूमि बाबरी मस्जिद'।

(वैसे तो इस समस्या का हल निकल नहीं पाया है। लेकिन बालक मन तुरत-फुरत फैसला करना जानता है।)

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